गुरुवक्त्रे स्थितं ब्रह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः ।
गुरोर्ध्यानं सदा कुर्यात् पुरूषं स्वैरिणी यथा ।।
अर्थ : गुरुके श्रीमुख में शब्द-ब्रह्मका वास होता है और उनकी कृपासे ही ब्रह्मकी (अर्थात आत्मज्ञानकी) अनुभूति होती है। गुरुका ध्यान सदैव करना चाहिए जिस प्रकार एक पतिव्रता स्त्री मात्र अपने पतिका ध्यान सदैव करती है।
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