आजके अनेक नास्तिक बुद्धिजीवी, व्यावहारिक ज्ञान देनेवाले भारी भरकम निधर्मी ग्रन्थोंको पढकर, देश और विदेशमें उच्च शिक्षा ग्रहण कर भिन्न उपाधियोंसे विभूषित होकर, स्वयंको पण्डित समझते हैं । हमारी वैदिक संस्कृतिमें नास्तिकोंको पण्डित नहीं कहा गया है, नास्तिक तो कृतघ्न होते हैं ! जिस ईश्वरने इस सृष्टिकी रचना की, मनुष्यको जीवन दिया, उसके जीवनयापन हेतु सर्व साधन ही नहीं दिए; अपितु उसे जन्म-मृत्युके चक्रसे मुक्त होने हेतु भिन्न योगमार्गोंको भी भिन्न अध्यात्मविदोंके माध्यमसे बताया, उनके अस्तित्वको नकारनेवाला भला पण्डित कैसे हो सकता है ?
आजके तथाकथित बुद्धिवादी ईश्वरके अस्तित्वको नकारकर स्वयंको पण्डित सिद्ध कर, समाजको दिशाभ्रमित करनेमें लगे रहते हैं, ऐसे सभी लोगोंने परम आदरणीय महात्मा विदुरके इस अमृत वचनका अवश्य पठन करना चाहिए, जिसमें पण्डितके लक्षणोंंको उन्होंने सुस्पष्ट होकर बताया है –
निषवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते ।
अनास्तिकः श्रद्धान एतत् पण्डितलक्षणम् ।। – विदुर नीति
अर्थ : जो पुरुष उत्तम कर्मोंका आचरण करता है, निन्दित कर्मोंसे दूर रहता है, नास्तिकतासे रहित एवं श्रद्धावान है, ऐसा व्यक्ति ही पण्डित कहलाने योग्य है ।
हिन्दू राष्ट्रमें वैदिक धर्मशास्त्रोंको विद्यालयोंके पाठ्यक्रमोंमें सम्मिलित किया जाएगा; फलस्वरूप आजके समान नास्तिक बुद्धिजीवी प्रजाति नहीं होगी । – तनुजा ठाकुर
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