यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्य धिगच्छति ।
तथा गुरु गतां विद्यां शुश्रूषूरधिगच्छति ।। – मनुस्मृति (2:222)
अर्थ : जिस प्रकार खनित्रसे ( भूमि खोदने वाला यंत्र कुदाल ) धरतीको खोदता हुआ मनुष्य जलको प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार गुरुकी सेवा करते रहनेसे शिष्य गुरुकी विद्याको सहज ही प्राप्त कर लेता है ।
भावार्थ : इतिहास साक्षी है, गुरु- शिष्य परंपरा अंतर्गत ऐसे अनेक शिष्य हुए हैं जिन्होंने बिना वेद उपनिषदके पठनके मात्र गुरु सेवासे आत्मज्ञानकी कुंजीको प्राप्त कर लिया है । हमारे धर्मशास्त्रोंमें गुरुकी इसी महत्वके बारेमें गुणगान किया गया है । ‘मंत्र मूलं गुरूर वाक्यं, मोक्ष मूलं गुरु कृपा’ एवं ‘गुरु कृपा हि केवल्म शिष्य परम मंगलम’ जैसे सुवचन गुरुसेवा और गुरु आज्ञाका बोध कराते हैं । गुरु सेवामें लीन शिष्य कब अद्वैत भावमें लीन हो जाता है यह शिष्यको भी बोध नहीं होता यह गुरुसेवाका महत्व है । गुरु सेवा दो प्रकारके होते हैं – सगुण सेवा और निर्गुण सेवा – सगुण सेवा अर्थात गुरुके देहसे संबन्धित सेवा करना जैसे गुरुके लिए भोजन बनाना, गुरुके वस्त्र धोना गुरुके कमरेकी स्वच्छता करना इत्यादि । निर्गुण सेवाका अर्थ है गुरुके आश्रमकी व्यवस्था संभालना, गुरुके कार्यमें यथाशक्ति तन, मन धन, बुद्धि कौशल्य और अपने सूक्ष्म इंद्रियोंके माध्यमसे योगदान देना । गुरुसेवा करते समय कुछ तथ्योंका ध्यान रखान चाहिए :
• गुरु सेवा कृतज्ञताके भावसे आनंदपूर्वक करना चाहिए, इस ब्रह्मांडमें इतने जीव है तथापि मुझ जैसे अधमको गुरुसेवाकी संधि ईश्वरने दी इस भावसे गुरुसेवा करना चाहिए ।
• गुरुसेवा करते समय देहभान एवं सामाजिक प्रतिष्ठाको त्यागकर अर्थात मैं फलां फलां हूं या मुझे इस सेवासे शारीरिक कष्ट होगा, समाज उलाहना देगा इत्यादि भावनाओंका त्याग कर सेवामें निरंतर निष्काम भावसे मात्र गुरुसे प्रेम करने हेतु गुरुसेवा करना चाहिए ।
• गुरुसेवा करनेसे पूर्व प्रार्थना करना चाहिए कि यह सेवा आप ही मुझसे करवा कर ले लें एवं सेवा अचूक, परिपूर्ण एवं निर्धारित कार्य पद्धति एवं समय अनुसार हो अर्थात गुरुको जैसा अपेक्षित है वैसा हो ।
• गुरु आज्ञा ही गुरुसेवा है गुरुकी आज्ञामें शिष्यका कल्याण निहित होता है अतः गुरुने यह आज्ञा क्यों दी इसके स्थानपर उनकी आज्ञाको चरितार्थ कैसे करूँ कि वे प्रसन्न हो जाएं इस भावसे गुरुसेवा करना चाहिए ।
• गुरुसेवा करते समय अनेक बार गुरु सबके समक्ष अपमानित करते हैं, जिससे कि हमारा अहं नष्ट हो , गुरुद्वारा अपमानित होनेका सौभ्गय विरलेको मिलता है अतः उनकी अपशब्द भी शिरोधार्य कर आनदपूर्वक सेवरत रहनेवाला जीव भवसागरसे मुक्त हो जाता है यह शास्त्र सिद्ध सिद्धांत है ।
• गुरुकी सेवा प्रत्येक व्यक्ति या साधक नहीं कर सकता, जिसमें अहंका प्रमाण न्यून हो, जिसमें दैवी गुण जैसे आज्ञापालन, त्याग, समर्पण, सेवाभाव, श्रद्धा, भक्ति एवं शरणागति हो वह ही गुरुसेवामें अखंडता साध्य कर पाता है । गुरुसेवमें लीन शिष्य निरक्षर हो तो भी वह वेदोंका ज्ञाता हो जाता है ।
• सर्व सामान्य व्यक्तिको पांच ऋण अवश्य देने होते हैं और वे है – देव, ऋषि, पितर, समाज और अतिथि; परंतु सतशिष्यको गुरु सभी ऋणोंसे मुक्त कर देते है और गुरुके कृपाके तेजसे शिष्यके अनेक जन्मोंके पाप पुण्य नष्ट हो जाते हैं ।
• गुरुसेवक होना अर्थात इस ब्रह्मांड के सर्वोच्च पदको प्राप्त करने समान है !
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