
नालं द्विजत्वं देवत्वमृषित्वं वासुरात्मजाः ।
प्रीणनाय मुकुन्दस्य न वृत्तं न बहुज्ञता ॥
न दानं न तपो नेज्या न शौचं न व्रतानि च ।
प्रीयतेऽमलया भक्त्या हरिरन्यद् विडम्बनम् ॥
दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा वजौकसः ।
खगा मृगाः पापजीवाः सन्ति ह्यच्युततां गताः ॥
– (श्रीमद्धा ७ । ७ । ५१-५२, ५४)‘
‘दैत्यबालको ! भगवानको प्रसन्न करनेके लिये केवल ब्राह्मण, देवता या ऋषि होना, सदाचार और विविध ज्ञानोंसे सम्पन्न होना तथा दान, तप, यज्ञ, शारीरिक और मानसिक शौच और बडे -बडे व्रतोंका अनुष्ठान ही पर्याप्त नहीं है । भगवान् केवल निष्काम प्रेम-भक्तिसे ही प्रसन्न होते हैं । और सब तो विडम्बनामात्र है ! भगवान्की भक्तिके प्रभावसे दैत्य,यक्ष, राक्षस, स्त्रियों, शूद्र, गोपालक, अहीर, पक्षी, मृग और बहुत-से पापी जीव भी भगवद्भावको प्राप्त हो गये हैं ।’