क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – १६)


यदि हमें हमारे प्रारब्धकी तीव्रताको सहजतासे सहन करना हो या अपने संचित कर्मोंको नष्ट करना हो तो दोनों ही स्थितियोंमें नामजप एक सरल माध्यम है । नामजपसे प्रारब्धकी तीव्रताका प्रभाव ऐसे न्यून होता है जैसे कोई कोयलेकी अग्निपर चल रहा हो और तेज (अग्नि) तत्वकी सिद्धि होनेके कारण उसे अग्निकी उष्णताका प्रभाव नहीं पड रहा हो, नामजपसे भी यही साध्य होता है । मन नामजपमें लीन होनेसे प्रारब्ध अनुसार सुख-दुःख तो मिलता ही है; किन्तु उसकी तीव्रताका बोध नहीं होता । मनके शान्त रहनेसे शरीर भी स्वस्थ रहता है और सबसे बडी बात है कि अखण्ड नामजप होनेसे ईश्वरीय कृपाका सतत संचार होता है; फलस्वरूप प्रारब्धकी तीव्रता ज्ञात नहीं हो पाती है या अनेक बार वह न्यून भी हो जाती है । नामजप करनेसे संचित, अर्थात जो पूर्व जन्मोंके फल होते हैंइसेजो हमें भविष्यके जन्मोंमें भोगने होते हैं, वह भी जलने लगते है और इसप्रकार जीव जन्म और मृत्युके चक्रसे मुक्त हो जाता है । वस्तुत: पापोंके क्षालनमें नामजप अग्नि समान कार्य करता है, तभी तो कहा गया है –
अज्ञानादथवा ज्ञानादुत्तम श्लोकनाम यत ।
संगकीर्तितमघम पुंसो देहो देधो यथा नलः ।। – श्रीमद भागवत

अर्थ : जिसप्रकार अग्निमें सोच समझकर या अज्ञानतामें लकडी डाली गई हो, दोनों ही स्थितियोंमें अग्नि लकडीको जला देती है, उसीप्रकार ईश्वरका नाम सोच समझ कर लें या अज्ञानतामें लें, दोनों ही स्थितियोंमें वह हमारे पापोंका नाश करता है । अर्थात नामजप सबका कल्याण करता है, जिन्हें इसमें विश्वास हो और जिन्हें विश्वास न हो ! अतः नामजप करें !



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