शास्त्र वचन

धर्मका सार


श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चाप्यवधार्यताम् । आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ॥ – वेदव्यास                                                                                    […]

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दुर्लभ मनुष्य देहका महत्त्व जानें !


इतः को न्वस्ति मूढात्मा यस्ति स्वार्थे प्रमाद्यति |
दुर्लभम् मानुषं देहं प्राप्य तत्रापि पौरुषं ||  – विवेकचूडामणि
अर्थ : दुर्लभ मनुष्य देह और उसमें भी पुरुषकी योनिको पाकर जो स्वार्थ साधनमें प्रमाद करता है उससे अधिक और मूढ कौन होगा |

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सत्य


नास्ति सत्यात् परो धर्मो नानृतात् पातकं परम् । अतः सर्वेषू कार्येषु सत्यमेव विशिष्यते ।।                    अर्थ : ‘सत्यसे बढकर धर्म और असत्यसे बढकर दूसरा कोई पाप नहीं है’; अतः सभी कार्योंमें सत्यको ही श्रेष्ठ माना गया है ।

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तारक मंत्र श्री राम है !!


चौपाई : * राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी॥ नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा॥1॥ भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी ने भक्तों के हित के लिए मनुष्य शरीर धारण करके स्वयं कष्ट सहकर साधुओं को सुखी किया, परन्तु भक्तगण प्रेम के साथ नाम का जप करते हुए सहज ही में […]

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शास्त्र वचन


            सर्वतो मनसोsसङ्गमादो संगं च साधुषु |  दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भुतेष्वद्धा  यथोचितं || अर्थ : पहले शरीर, संतान आदिमें मनकी अनासक्ति सीखें | तत्पश्चात् भगवानके भक्तोंसे प्रेम कैसा करना चाहिए, यह सीखें | इसके पश्चात् प्राणियोंके प्रति यथायोग्य दया, मैत्री और विनयकी निष्कपट भावसे शिक्षा ग्रहण करें |   […]

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शास्त्र वचन


 परेषाम् यदसूयेत न तत् कुर्यात्  स्वयम्  नरः । यो ह्यसूयुस्तथा युक्त: सोsवहासम् नियच्छति ।। मनुष्य दूसरेके जिस कर्मकी निंदा करे, उसको स्वयं भी न करे । जो दूसरोंकी निंदा तो करता है; किन्तु स्वयं उसी निन्द्य कर्ममें लगा रहता है, वह उपहासका पात्र होता है ।

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पंडित किसे कहते हैं ?


आत्मज्ञानं समारंभस्तितिक्षा धर्म नित्यता | यमर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डिताः उच्यैते || – विदुर नीति अर्थ : जो व्यक्ति अपनी आत्मासे परिचित है (आत्मसाक्षात्कारी हो गया हो), अपनी शक्तिको जानता है , अपनी शक्तिके अनुरूप कार्य करता है उसे ही पंडित कहते हैं ।

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जिन्हें लगता है वे पूर रूपेण अहिंसक है उनके लिए यह सुवचन !


के न हिंसन्ति जीवान्वै लोकेऽस्मिन् द्विज़सत्तम । बहु संचिन्त्य इति वै नास्ति कश्चिदहिंसक: ।। अहिंसायां तु निरता यतयो व्दिजसत्तम । कुर्वन्त्येव हि हिंसां ते यत्नादल्पतरा भवेत् ।। – महाभारत ३.२०८.३३-३४ अर्थ – हे ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ, इस संसारमें ऐसा कौन है जो हिंसा नहीं करता | अनेक बार चिंतन करनेके पश्चात यह पाया कि इस संसारमें ऐसा कोई नहीं […]

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बुद्धिमान कौन ?


उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते हयाश्च नागाश्च वहन्ति देशिताः । अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥ – हितोपदेश अर्थ : जिसे स्पष्ट रूपसे बताया जाये वह तो घोडे एवं सर्प जैसे पशु भी ग्रहण कर समझका उसका पालन कर लेते हैं , बुद्धिमान या विवेकी तो उसे कहा जाएगा जो बिना बोले समझ लें | विवेकशेल होनेका […]

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मितभाषी होना या शांत रहना सबसे हितकारी है


आत्मनो मुखदोषेण बध्यन्ते शुकसारिकाः । बकास्तत्र न बध्यन्ते मौनं सर्वार्थसाधनम् । । – सुभाषितरत्नसमुच्चय अर्थ : शांत रहनेवाले बगुलेकी अपेक्षा, तोते, सारिका  एवं अन्य बोलनेवाले पक्षी अपने बोलनेके दोषके कारण पकडे जाते हैं ! मितभाषी होना या शांत रहना सबसे हितकारी है !

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