के न हिंसन्ति जीवान्वै लोकेऽस्मिन् द्विज़सत्तम । बहु संचिन्त्य इति वै नास्ति कश्चिदहिंसक: ।।
अहिंसायां तु निरता यतयो व्दिजसत्तम । कुर्वन्त्येव हि हिंसां ते यत्नादल्पतरा भवेत् ।। – महाभारत ३.२०८.३३-३४
अर्थ – हे ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ, इस संसारमें ऐसा कौन है जो हिंसा नहीं करता | अनेक बार चिंतन करनेके पश्चात यह पाया कि इस संसारमें ऐसा कोई नहीं जो अहिंसक हो |
हिंसा तो योगियों या सन्यासियोंके हाथसे भी हो जाती है जो आर्ततासे अहिंसक होनेका प्रयास करते हैं | मात्र उनसे यह किंचित ही होता है क्योंकि वे इसके लिए अखंड प्रयासरत रहते हैं !
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