एकांतस्थितिरिंद्रियोपरमणे हेतुर्दमश्चेतस:
संरोधे करणं शमेन विलयं यायादहंवासना |
तेनानन्दरसानुभूतिरचला ब्राह्मी सदा योगिन
स्त्स्माच्चित्तनिरोश एव सततं कार्य: प्रयत्नानान्मुने || – विवेक चुडामणि
अर्थ : एकांतमें रहना इंद्रिय–दमनका कारण है, इंद्रिय दमन चित्तके निरोधका कारण है और चित्त-निरोधसे वासनाका नाश होता है तथा वासनाके नष्ट हो जानेसे योगीको ब्रह्मानन्दरसका अविचल अनुभव होता है; इसलिए मुनिको सदा प्रयत्नपूर्वक चित्तका निरोध करना चाहिए |
भावार्थ : अनेक संतोंने साधकको एकांतमें रहनेका संदेश दिया है । एकांतवाससे ही मनमें किस प्रकारके विचार आ रहे हैं ?, इसका अभ्यास संभव है और इसे आत्मनिरीक्षण कहते हैं । आत्मनिरीक्षणसे ही आत्ममंथन आरंभ होता है और बुद्धिके माध्यमसे हमें समझमें आता है कि प्रत्याहार और चित्तकी वृत्तियोंका निरोध क्यों करना चाहिए ?। जीवको ब्रह्मसे विभक्त करनेवाला जो मुख्य विचार है, वह है वासना । जिनमें वासनाका लय हो गया हो, उन्हें संत कहते हैं; परंतु इस सृष्टिके अस्तित्त्वका भी मूल कारण वासना ही है; अतः मनपर वासनाके संस्कार अत्यधिक तीव्र होते हैं और परिणामस्वरूप वासनापर नियंत्रण पाना अत्यंत कठिन होता है । ऐसेमें जिनमें वासना नष्ट हो गया हो, ऐसे तपस्वीसे प्रचंड प्रमाणमें त्रिगुणातीत लहरियोंका विकिरण या प्रक्षेपण होता है, इससे चित्तकी शुद्धिका चरण आरंभ हो जाता है और विवेक जागृत हो जाता है । एक बार विवेक जागृत हो जाए तो उसकी सहायतासे हम एकांतमें अपने मनके संस्कारोंका निरोध आरंभ कर सकते हैं । अतः हमारे ऋषि-मुनि घनघोर वनमें जाकर एकान्तवासकर चित्त वृत्तिका निरोध करते थे और इंद्रिय निग्रहका अखंड प्रयासकर ब्रह्म तत्त्वसे एकरूप होते थे । कलियुगमें भी साधकने थोडे समय अवश्य ही प्रतिदिन एकांतमें रहकर अपने मनके विचारोंका अभ्यास करना चाहिए और मनके विचारोंको नियंत्रित करने हेतु योग्य प्रयास, जैसे मनको स्वयंसूचना देना, अपने इष्टसे प्रार्थना करना, योग्य नामजप, कलिकालके तमोगुणी प्रभावके कारण मन एवं बुद्धिपर आनेवाले काले आवरणको नष्ट करने हेतु नियमित आध्यात्मिक उपाय करनेका और संतसंगमें रहकर धर्मकार्यमें यथाशक्ति योगदान देनेका प्रयास करनेसे इंद्रियका निग्रह शीघ्र संभव होता है, ऐसा मेरा अनुभव है । – तनुजा ठाकुर
Leave a Reply