ज्ञान प्राप्ति जिससे भी हो, वे हमसे श्रेष्ठ होते हैं, चाहे उनकी आयु हमसे अल्प (कम) क्यों न हो और ज्ञान देनेवाला व्यक्ति वात्सल्य भावसे ही ज्ञान देता है; अतः हमारे धर्मशास्त्रोंमें ज्ञान देनेवालेको पिता तुल्य और जन्म देनवाले पितासे भी अधिक उच्च स्थान दिया गया है । इस सम्बन्धमें मनुस्मृतिमें एक श्लोक यह तथ्यकी पुष्टि करता है –
अध्यापयामास पितृन् शिशुरङ्गिरस: कवि: । पुत्रका इति होवाच् ज्ञानेन परिगृहं तान् ।। – मनुस्मृति
अर्थात : अंगिरसके वेदज्ञ पुत्रने अपनी आयुसे वयोवृद्ध ज्येष्ठ चाचा, मामा आदि, जिन्हें उन्होंने वेद-विद्याका ज्ञान दिया और उन्हें ‘हे पुत्रों’ कहकर सम्बोधित किया; क्योंकि वह ज्ञानके क्षेत्रमें उनसे बडे थे । इतिहास साक्षी है, अनेक बार गुरुकी आयु शिष्यसे न्यून (कम) रही है तथा शिष्यने गुरुके चरणोंकी धूलको शिरोधार्य किया है और इसका एक सर्व विदित उदाहरण है राजा जनक एवं उनके बालक–गुरु, महर्षि अष्टावक्र हैं ।
वस्तुत: इस स्थूल देहकी आयु इन नेत्रों एवं बुद्धिसे ज्ञात हो सकती है; परन्तु साधना कर मुक्त हुए जीवकी आयु, स्थूल देहकी दिखाई देनेवाली आयुसे अधिक हो सकती है । हमारी संस्कृतिमें सम्मान और श्रेष्ठता स्थूलसे दिखाई देनेवाले दृश्य या वस्तुसे नहीं आंकी जाती थी, अपितु उस वस्तु या जीवकी सूक्ष्म पक्षसे ही उसकी श्रेष्ठता सिद्ध होती थी । – पूज्या तनुजा ठाकुर
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