पुष्पं पुष्पं विचिन्वीत न कारयेत |
मालाकार इवारामे न यथागंगारकार: || – विदुर निति
अर्थ : जैसे माली बगीचेमें एक-एक फूलको ग्रहण करता है; किन्तु मूलसे उनका उच्छेद नहीं करता, उसीप्रकार अंगार कारक वृक्षोंको समूल नाश करके कोयला बनता है, वैसे प्रजाका समूल उच्छेद कदापि न करें |
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