शास्त्र वचन

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युवैव धर्मशीलः स्यादनित्यं खलु जीवितम् । कृते धर्मे भवेत् कीर्तिरिह प्रेत्य च वै सुखम् ॥ अर्थ :  युवावस्थामें ही सबको धर्मका आचरण करना चाहिए; क्योंकि जीवन निःसन्देह अनित्य है । धर्माचरण करनेसे इस लोकमें मनुष्यकी कीर्तिका विस्तार होता है और परलोकमें भी उसे सुख मिलता है । मन्योर्हि विजयं कृष्णे प्रशंसन्तीह साधवः । क्षमावतो जयो […]

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श्वः   कार्यमद्य   कुर्वीत   पूर्वाह्णे   चापराह्णम् । न हि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वा कृतम् ॥ अर्थ : कल किया जानेवाला कार्य आज ही पूर्ण कर लेना    चाहिए । जिसे सायंकालमें करना है, उसे प्रातःकालमें ही कर लेना चाहिए; क्योंकि मृत्यु यह नहीं देखती कि इसका कार्य अभी पूर्ण हुआ कि नहीं । आक्रुष्टस्ताडितः क्रुद्धः क्षमते […]

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यच्च कामसुखं वोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥ अर्थ : राजा सेनजित एवं ब्राह्मण संवादमें ब्राह्मण कहते हैं : संसारमें जो कुछ इस लोकके भोगोंका सुख है और जो स्वर्गका महान सुख है, ये दोनों तृष्णाक्षयसे (लौकिक जगतकी कामना या इच्छाके नाश) होनेवाले सुखकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं । […]

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अज्ञानप्रभवो मोहः पापभ्यासात् प्रवर्तते । यदा प्राज्ञेषु रमते तदा सद्यः प्रणश्यति ॥ अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे मोहकी उत्पत्तिका कारण बताते हुए कहते हैं : मोह अज्ञानसे उत्पन्न होता है और पापकी आवृत्तिसे बढता है । जब मनुष्य, विद्वानोंमें अनुराग करता है, तब उसका मोह तत्काल नष्ट हो जाता है । क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययनसंगतः । […]

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दुःखमेवास्ति न सुखं तस्मात् तदुपलभ्यते । तृष्णार्तिप्रभवं दुःख दुःखार्तिप्रभवं सुखम् ॥ अर्थ : महर्षि व्यास, युधिष्ठिरसे कहते हैं : संसारमें केवल दुःख ही है, सुख नहीं है, अतः दुःख ही उपलब्ध होता है । तृष्णाजनित पीडासे दुःख और दुःखकी पीडासे सुख होता है अर्थात दुःखसे आर्त हुए मनुष्यको ही उसके न रहनेपर सुखकी प्रतीति होती […]

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हितं यत् सर्वभूतानामात्मनश्च सुखावहम् । तत् कुर्यादीश्वरे ह्येतन्मूलं सर्वार्थ सिद्धये ॥ अर्थ : विदुर, धृतराष्ट्रसे कहते हैं : जो सम्पूर्ण प्राणियोंके लिए हितकर और अपने लिए भी सुखद हो, उसे ईश्वरार्पण बुद्धिसे करे; सम्पूर्ण सिद्धियोंका यही मूल मन्त्र है । भावमिच्छति सर्वस्य नाभावे कुरुते मनः । सत्यवादी मृदुर्दान्तो यः स उत्तम पूरुषः ॥ अर्थ : […]

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अर्थसिद्धिं परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत् । न हि धर्मादपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम् ॥ अर्थ : धृतराष्ट्रसे विदुर कहते हैं : जो अर्थकी पूर्ण सिद्धि चाहता हो, उसे पहले धर्मका ही आचरण करना चाहिए । जैसे स्वर्गसे अमृत दूर नहीं होता, उसी प्रकार धर्मसे अर्थ पृथक नहीं होता । अतिमानोsतिवादश्च तथात्यागो नराधिप । क्रोधश्चात्मविधित्सा च मित्रद्रोहश्च तानि षट् ॥ एत […]

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सत्यं नामाव्ययं नित्यमविकारि तथैव च । सर्वधर्माविरद्धेन योगेनैतदवाप्यते ॥ अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरको सत्यके लक्षण बताते हुए कहते हैं : नित्य एकरस, अविनाशी और अविकारी होना ही सत्यका लक्षण है, समस्त धर्मोंके अनुकूल कर्तव्य पालनरूप योगके द्वारा इस सत्यकी प्राप्ति होती है । परिच्छिद्यैव कामानां सर्वेषां चैव कर्मणां । मूलं बुद्धीन्द्रियग्रामं शकुन्तानिव पञ्जरे ॥ अर्थ […]

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अमात्सर्यं बुधाः प्राहुर्दाने धर्मे च संयमः । अवस्थितेन नित्यं च सत्येनामत्सरी भवेत् ॥ अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे कहते हैं : दान और धर्म करते समय मनपर संयम रखना अर्थात इस विषयमें दूसरोंसे ईर्ष्या न करना इसे विद्वान लोग ‘मत्सरताका अभाव’ कहते हैं । सदा सत्यका पालन करनेसे ही मनुष्य मत्सरतासे रहित हो सकता है । […]

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सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । न नित्यं लभते दुःखं न नित्यं लभते सुखम् ॥ अर्थ : महर्षि व्यास, युधिष्ठिरसे कहते हैं : सुखके पश्चात दुःख और दुःखके पश्चात सुख आता है । कोई भी न तो सदा दुःख पाता है और न निरन्तर सुख ही प्राप्त करता है । ये च मूढतमा लोके ये च […]

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