धर्मधारा- स्त्रियों ! अन्नपूर्णा कक्ष आपके व्यक्तित्वका दर्पण होता है, वहां देवत्व निर्माण करें


स्त्रियों ! अन्नपूर्णा कक्ष आपके व्यक्तित्वका दर्पण होता है, इस तथ्यका ध्यान रख वहां देवत्व निर्माण करें !

स्त्री साधिकाओंद्वारा रसोईघरकी सेवाके मध्य उनके दोष किस प्रकार परिलक्षित होते हैं एवं उन्होंने अपने दोषोंका निर्मूलन क्यों करना चाहिए, यह लेख इसी सम्बन्धमें है ।

* वैदिक उपासना पीठके आश्रममें देश-विदेशसे हिन्दू स्त्रियां सेवा हेतु आती हैं । मैंने पाया है कि अधिकांश स्त्रियोंमें सात्त्विक एवं पौष्टिक आहार कैसे बनाएं, इसका उन्हें ज्ञान नहीं होता एवं वे अत्यधिक अस्वच्छ व अव्यवस्थित रहती हैं, यहांतक कि साडी पहनकर और स्नानकर भोजन बनाना, यह भी उनके लिए कष्टप्रद होता है । जब कुछ अधेड आयुकी गृहिणियां सेवा हेतु आश्रममें आती थीं तो पहले तो मैं सोचती थी कि वे अनेक वर्षोंसे अपनी गृहस्थी सम्भालती रही हैं; अतः वे निश्चित ही मुझसे रसोई बनानेमें या उसकी देखरेखमें अधिक निपुण होंगी; क्योंकि मैं तो २७ वर्षकी आयुमें ही पूर्ण समय साधनारत हो गई थी और मैंने रसोईकी सेवा इससे पूर्व भी बहुत ही कम की थी और साधनामें आनेके पश्चात भी अधिकाधिक समय श्रीगुरुने मुझे धर्मप्रसारकी सेवा दी थी; अतः मुझे इसका बहुत अभ्यास या ज्ञान नहीं था; किन्तु मैंने ९५ प्रतिशत स्त्रियोंमें इस स्त्री सुलभ गुणका अभाव पाया है !

* सर्वप्रथम मैंने पाया है कि अधिकांश स्त्रियां अत्यधिक आलसी होती हैं; अतः चार दिवस बीस साधकोंके लिए भी तीन समयका भोजन आनन्दपूर्वक नहीं बना पाती हैं, अनेक बार यदि रात्रिमें दिनकी थोडीसे दाल या तरकारी बची हो तो कहती हैं कि इसीमें हो जाएगा जिससे उन्हें पुनः बनाना न पडे; किन्तु उससे सभी अच्छेसे भोजन कर पायेंगे क्या? इसका, उनसे विचार नहीं होता है । उनके मुखके हाव-भाव मुझे बता देते हैं कि वे इतनी श्रमवाली सेवा नहीं कर सकती हैं । मुझे, उन्हें देखकर भान होता है कि मैं अपंग (अनिष्ट शक्तियोंके अनके वर्षोंके सूक्ष्म आक्रमणने मुझे अब आधे घण्टे खडे रहने योग्य भी नहीं छोडा है) भली और आवश्यकता पडनेपर अपनी मानसिक शक्तिके बलपर उनसे अधिक श्रमवाली सेवा, प्रेम उत्साह एवं आनन्दपूर्वक कर लेती हूं, यद्यपि सेवाके पश्चात मुझे अत्यधिक शारीरिक कष्ट होगा यह ज्ञात होता है, अनेक बार तो मैं तीन-तीन चार-चार ऐसी सेवा करनेके क्रममें अचेतन समान बिछावनमें पडी रहती हूं या शारीरिक वेदनाके कारण आठ-दस घण्टे उठ नहीं सकती हूं या थकावटके कारण मुझे सम्पूर्ण शरीरमें ‘सूजन’ आ जाती है या ज्वर आ जाता है, तब भी मैं कभी शारीरिक श्रमवाली सेवासे भागती नहीं हूं और आवश्यकता करनेपर आनन्दपूर्वक करती हूं; किन्तु सामान्य स्वास्थ्यवाली स्त्रियां आलस्यवश ऐसी सेवा नहीं कर पाती हैं या नहीं करना चाहती हैं ।

* स्त्रियो ! आनेवाले आपदाकालमें बिजली नहीं होगी; अतः आपको आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणोंके बिना ही सब कार्य करने होंगे, इसकी पूर्वसिद्धता अभीसे करें ! आज अधिकांश स्त्रियोंको अनेक शारीरिक रोग हैं, इसके पीछे मुख्य कारण उनका आलसी एवं तमोगुणी होना भी है ।

* समयबद्धता यह भी आश्रम-जीवनका एक अभिन्न भाग है; किन्तु यह भी गुण मैंने अधिकांश स्त्रियोंमें नहीं पाया है । अर्थात बताई गई समय-सीमामें भोजन बनाकर परोसना है, यह गुण भी उनमें नहीं होता है ।

* एक और बात जो मैंने देखी कि सात्त्विक भोजन कैसे बनाना चाहिए ? यह भी उन्हें ज्ञात नहीं है । अधिकांश स्त्रियां ऐसा भोजन बनानेका आग्रह करती हैं, जो तमोगुणी होता है या तीखा, तला-छका, चटपटा या अत्यधिक खट्टा हो । जैसे पनीर, खट्टी कढी, तमोगुणी आहार हैं, यह अधिकांश स्त्रियोंको ज्ञात नहीं है । तरकारी सात्त्विक रीतिसे कैसे काटनी है ? यह बतानेपर भी वे पुनः अपने तमोगुणी ढर्रेमें आ जाती हैं ।

* यदि उनपर चार दिवस भी पूर्ण रूपसे अन्नपूर्णा कक्षकी सेवा छोड दी जाए तो शीतकपाटिकामें  (फ्रिजमें) तरकारी सड जाती हैं, भोजन आवश्यकतासे अधिक बना देती हैं और न खाती हैं, न ही किसीको देती हैं और वह यूं ही चार दिवस पडा रहता है । यदि पूछती हूं तो झटसे कहती हैं, “हम भूल गए या उसका क्या करना है ? मुझे समझमें नहीं आया !” अन्नका एक कण भी व्यर्थ करना अन्नपूर्णा माताका अपमान है, इस बातका उन्हें भान ही नहीं होता है ।

* सर्वत्र अस्वच्छता एवं अव्यवस्था दिखाई देती है । स्थिति इतनी विकट है कि कुछ स्त्रियोंके अन्नपूर्णा कक्ष (रसोईघरमें) कुछ दिवस सेवाके पश्चात वहांके स्पन्दन परिवर्तित हो जाते हैं; क्योंकि वे बहुत अस्वच्छ रहती हैं ।

* दूसरोंका विचार करना, यह भी गुण नहीं दिखाई देता है, जैसे मसालेके डिब्बे भरकर रखना, जिससे अन्य कोई आए तो उसे कोई अडचन न आए ! अधिकांश स्त्रियां, जो उन्हें भोजन रुचिकर लगता है, उसे ही बनाती हैं, यह भी दूसरोंका विचार न करना, इस दोषके कारण होता है ।

* अधिकांश स्त्रियोंके भोजन सम्बन्धी संस्कार अत्यधिक तीव्र होते हैं । वे सभी कुछ प्रेमसे प्रसाद मानकर भी ग्रहण नहीं कर पाती हैं । भोजन सम्बन्धी तीव्र संस्कार, अहंका लक्षण है; क्योंकि यह मुझे अच्छा लगता है यह नहीं, इसका भान सतत होनेवाले जीवका अहम् अधिक होता है और आनेवाले आपातकालमें तरकारीकी पत्तियां भी सजहतासे उपलब्ध नहीं होंगी; अतः समय रहते अपने संस्कारकेन्द्रोंको न्यून करें !

* यदि पच्चीस लोग भोजन ग्रहण करनेवाले हैं तो या तो भोजन कम बना देती हैं या बहुत अधिक बना देती हैं अर्थात अनुमान भी ठीकसे नहीं लगा पाती हैं, चाहे वे पच्चीस वर्षसे गृहस्थी क्यों न सम्भालती हों !

* कुछ स्त्रियां कहती हैं कि यदि हमें कुछ नूतन पकवान बनाना हो तो ही यह कार्य करनेमें आनन्द आता है अन्यथा हमारा मन भोजन बनानेको नहीं करता है । कार्यमें ऊब हो सकती है, सेवामें सतत आनन्दकी प्राप्ति होती है; अतः कार्यका रूपान्तरण सेवामें करें ! इस हेतु भोजन बनाते समय सर्व आध्यात्मिक दृष्टिकोण आत्मसात करें !

स्त्रियो ! आपका अन्नपूर्णा कक्ष आपके व्यक्तित्वका दर्पण होता है, यह ध्यान रख, उसमें निपुणता प्राप्त करें ! आपकी सेवाके पश्चात जो भी वहां आए, उसे लगना चाहिए कि किसी दैवी गुणवाली स्त्री-साधिकाने यहां सेवा की थी ।

एक महत्त्वपूर्ण तथ्य ध्यान रखें ! आश्रममें भोजन अध्यात्मशास्त्रीय दृष्टिकोणसे बनाया जाता है । यहां अल्प समय, अल्प धन और ऋतु अनुरूप पौष्टिक, स्वादिष्ट व सात्त्विक भोजन बनाया जाता है; अतः यहां सिखानेकी अपेक्षा यह सुन्दर तथ्य सीखकर जाएं ! उपर्युक्त तथ्य सभी स्त्रियां लिखकर रखें, जिससे जब आप कभी किसी आश्रममें जाकर सेवा करें तो आपसे ऐसी चूकें न वहां न आपके अन्नपूर्णा कक्षमें हों, इस हेतु स्वभावदोष निर्मूलन प्रक्रिया आजसे आरम्भ करें और यह सीखने हेतु उपासनाके आश्रममें आकर कुछ दिवस सेवा करें ! (०५.०१.२०१७)

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