दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं. एक वो, जो मौका आने पर साथ ‘छोड़’ देते हैं…और दूसरे वो, जो साथ देने के लिए मौका ‘ढूंढ़’ लेते हैं. अगर आप भारत के नज़रिए से देखें तो यहां देश का साथ देने वाले लोग ज़्यादा है.. लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं.. जो मौका आने पर अक्सर साथ ‘छोड़’ देते हैं. एक ऐसे ही व्यक्ति का नाम है, फारुक अब्दुल्ला. जिनके पास पासपोर्ट तो भारत का है, उन्हें सारी सुविधाएं भी भारत के Tax Payers के पैसों से ही मिलती हैं, लेकिन जब भी मौका मिलता है, वो पाकिस्तान को अपना जिगरी दोस्त बताने से पीछे नहीं हटते.
गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को मिली जीत, फारुक अब्दुल्ला के गले नहीं उतर रही. एक तरफ वो दो राज्यों की जनता के लोकतांत्रिक अधिकार का अपमान करते हैं और ये कहते हैं, कि इन दोनों चुनावों में जीत के लिए झूठ का सहारा लिया गया…और धर्म के आधार पर लोगों को बांटने का काम किया गया. और दूसरी तरफ वो ये कहते हैं कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ कभी भी.. किसी भी प्रकार की साज़िश नहीं करता..और हिन्दुस्तान का अंत होने ही वाला है.
यानी फारुक अबदुल्ला को हिंदुस्तान में हमेशा कमियां नज़र आती हैं और पाकिस्तान उन्हें बहुत प्यारा लगता है. पहले आप फारुक अब्दुल्ला का ये बयान सुनिए, फिर हम उनकी पाकिस्तान वाली ग़लतफहमी को दूर करेंगे. और इसके लिए हम पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, लेफ्टिनेंट जनरल नसीर जांजुआ की मदद लेंगे. जो इन दिनों इस्लामाबाद में बैठकर….भारत पर परमाणु हमले के सपने देख रहे हैं.
फारुक अब्दुल्ला के मुताबिक, पाकिस्तान कभी साज़िश नहीं कर सकता. लेकिन, इस्लामाबाद में पाकिस्तान की National Security Policy, पर हुए एक सेमीनार में, पाकिस्तान के NSA ने अपना भारत वाला Vision स्पष्ट कर दिया है. नसीर जांजुआ ने सार्वजनिक मंच से ना सिर्फ भारत पर परमाणु हमले की धमकी दी है. बल्कि दुनिया को भ्रमित करने के लिए पाकिस्तान ने भारत के गृह मंत्री राजनाथ सिंह और बीजेपी के नेता सुब्रमण्यन स्वामी के Video को भी Propaganda के तौर पर इस्तेमाल किया है. इस दौरान उन्हें इस बात की भी तकलीफ थी..कि कश्मीर के मुद्दे पर अमेरिका…भारत की भाषा बोल रहा है. अब आप पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की ये टिप्पणी सुनिए और खुद ये तय कीजिए, कि फारुक अब्दुल्ला को ये सब दिखाई नहीं दे रहा.. या फिर वो इसे देखना ही नहीं चाहते ?
पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के विचारों और पाकिस्तान की हरकतों से ये पता चलता है कि वो भारत के बारे में अच्छा नहीं सोचता और भारत में होने वाली हर गतिविधि पर पैनी नज़र रखता है.. ताकि उसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर सके. गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव में पाकिस्तान के मीडिया की बहुत दिलचस्पी थी… पाकिस्तान के अखबार The Dawn की आज की Headline कहती है…Pakistan Ploy Works For Modi As BJP Wins Gujarat And Himachal Pradesh… इस लेख में वर्ष 2002 के गुजरात चुनावों का भी ज़िक्र किया गया है.
लेख में लिखा गया है, कि फरवरी 2002 में गोधरा में ट्रेन जलाने की घटना पर नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान पर दोष मढ़ा और चुनाव जीत लिया. इसी तरह इस बार भी चुनाव प्रचार के अंतिम समय में उन्होंने पाकिस्तान को बीच में घसीट लिया, जो उनकी जीत में आंशिक रूप से मददगार साबित हुआ. इस लेख में राहुल गांधी की चुनावी रैलियों में जुटी भीड़ का ज़िक्र करते हुए कहा गया…कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व सेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर के साथ पाकिस्तान के पूर्व हाई कमिश्नर की मीटिंग पर टिप्पणी की. जिसमें बीजेपी को गुजरात में हराने पर बात हुई थी.
पाकिस्तान में मौजूद बुद्धिजीवी, नेता और आतंकवादियों की पैरवी करने वाले पूर्व सेना प्रमुख बड़ी बेचैनी से गुजरात और हिमाचल के चुनावी नतीजों का विश्लेषण देख रहे थे. आज हमने पाकिस्तान के कई News Channels की Reports भी देखीं, जिनमें इसी बात का अफसोस मनाया जा रहा है कि आखिरकार गुजरात और हिमाचल प्रदेश में बीजेपी कैसे जीत गई ? अगर फारुक अब्दुल्ला इस वक्त DNA देख रहे हैं…तो पाकिस्तानी मीडिया की Clips देखकर, वो अपनी कई ग़लतफहमियां दूर कर सकते हैं.
आपने देखा कि… पाकिस्तान को राहुल गांधी से कितनी उम्मीदें हैं ?
पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने जब पाकिस्तान बनाया था, तो कहा था कि पाकिस्तान में रहने वाले लोग अपनी अपनी इबादतगाहों, मस्जिदों या मंदिरों में जाने के लिए आज़ाद हैं. किसी का मज़हब क्या है, इसका हुकूमत से कोई ताल्लुक नहीं है.
लेकिन आज के ज़माने के कट्टर पाकिस्तान में.. जिन्ना के इन दावों का दम निकल चुका है. क्योंकि पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों पर लगातार अत्याचार हो रहे हैं. ताज़ा ख़बर ये है कि पाकिस्तान में रहने वाले कुछ सिखों का ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन करवाया जा रहा है. और वहां की सरकार खामोश बैठी है. भारत में रहने वाले फारुख अब्दुल्ला जैसे कुछ बुद्धिजीवी दिन रात पाकिस्तान की तारीफ करते रहते हैं. उन्हें पाकिस्तान, भारत से ज्यादा अच्छा लगता है. लेकिन आज हम जो ख़बर आपको दिखाएंगे, उसे देखकर ऐसे बुद्धिजीवियों की आंखें खुल जाएंगी. सबसे पहले आपको ये पूरी ख़बर समझा देते हैं.
ख़बर ये है कि पाकिस्तान के ख़ैबर पख्तून-ख्वा प्रांत में सिखों का धर्म परिवर्तन करके उन्हें मुसलमान बनाया जा रहा है. ख़ैबर पख्तून-ख्वा के हांगू ज़िले में एक तहसील है, जिसका नाम है – टाल. इस तहसील में रहने वाले करीब 60 सिखों ने अपने ज़िला प्रशासन से सुरक्षा मांगी है. इन लोगों का आरोप है कि टाल तहसील के Assistant Commissioner याकूब ख़ान ने उनसे ये कहा कि अगर वो असुरक्षित महसूस करते हैं, तो उन्हें इस्लाम कबूल कर लेना चाहिए.
यानी एक सरकारी अधिकारी अल्पसंख्यकों से इस्लाम धर्म अपनाने के लिए कह रहा है. इस घटना के बाद सिख नेता फरीद चंद सिंह ने Assistant Commissioner के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई. पहले तो ज़िला प्रशासन ने इससे इनकार किया. लेकिन जब दबाव पड़ा तो फिर मजबूरी में उस अधिकारी को निलंबित कर दिया गया.
बहुत सारे लोगों को ये पाकिस्तान से आई एक छोटी सी ख़बर लग रही होगी.. लेकिन हमें लगता है कि इस ख़बर को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए. पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों पर अत्याचार करके.. उनका धर्म परिवर्तन करवाने का काम पिछले कई दशकों से चल रहा है. जिस इलाके में ये घटना हुई है, वहां पर सिख समुदाय के लोग वर्ष 1901 से रह रहे हैं. यानी भारत और पाकिस्तान के बंटवारे से पहले ही इस इलाके में सिख समुदाय के लोग रहते हैं. लेकिन इसके बावजूद उन पर ज़ुल्म हो रहे हैं. पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए.. पूरे सम्मान के साथ ज़िंदगी जीना बहुत मुश्किल है. और वक़्त गुज़रने के साथ वहां के हालात और ख़राब होते गये हैं.
1947 में जब पाकिस्तान बना था, उस वक्त वहां 23% अल्पसंख्यक या गैर-मुस्लिम थे. लेकिन अब वहां पर सिर्फ 3 से 4% अल्पसंख्यक बचे हैं. किसी देश की आबादी का 20 फीसदी हिस्सा अगर गायब हो जाए.. तो ये बहुत बड़ी बात होती है. अब सवाल ये है कि पाकिस्तान के करीब 20% अल्पसंख्यक कहां चले गए? इसका जवाब ये है कि अल्पसंख्यकों का या तो ज़ोर-ज़बरदस्ती से धर्म बदल दिया गया. या फिर उन्हें मार डाला गया.
आज़ादी के बाद 1951 में पाकिस्तान में करीब 15% हिंदू समुदाय के लोग रहते थे. यानी उस वक्त पाकिस्तान में हिंदुओं की जनसंख्या करीब 50 लाख थी. पाकिस्तान में 1998 के बाद अब जाकर जनगणना हो रही है. और उसमें अभी ये पता नहीं चल पाया है कि अब पाकिस्तान में कितने हिंदू और सिख बचे हैं. लेकिन 1998 की जनगणना के मुताबिक पाकिस्तान में सिर्फ 1.6% हिंदू बचे थे यानी करीब 21 लाख.
इसका मतलब ये हुआ कि 1951 से 1998 तक पाकिस्तान से हर साल 60 हज़ार हिंदू गायब होते रहे. और इस हिसाब से आज पाकिस्तान में सिर्फ 10 लाख हिंदू ही बचे होंगे. और सिखों की संख्या भी बहुत कम होगी, हालांकि पाकिस्तान की हिंदू और सिख जनसंख्या का औपचारिक आंकड़ा आना अभी बाकी है.
लेकिन आंकड़ों और घटनाओं का विश्लेषण करने से ये पता चलता है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं. कुल मिलाकर पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यक वो असहाय लोग हैं, जिनके लिए कोई आवाज़ नहीं उठाता. जिनके लिए कोई संयुक्त राष्ट्र में नहीं जाता. जिनके लिए कोई साहित्यकार, कोई लेखक या कोई फिल्मकार…अपना अवॉर्ड वापस नहीं करता. सवाल ये है कि फारुक अबदुल्ला को पाकिस्तान के ये ज़ुल्म.. दिखाई क्यों नहीं देते ? हमें लगता है कि ये DNA Test दुनिया के तमाम बुद्धिजीवियों को ज़रूर देखना चाहिए ताकि उनका वैचारिक दायरा बढ़ सके.
पाकिस्तान में कैसे अल्पसंख्यक समुदाय पर अत्याचार होते हैं, आज हमने इस विषय पर बहुत रिसर्च किया. और इस रिसर्च में हमें बहुत सी चौंकाने वाली बातें पता चली हैं. 14 अगस्त 1947 को जब पाकिस्तान आज़ाद हुआ तो उस वक्त उसकी राजधानी कराची थी. उस ज़माने में कराची सामाजिक सदभाव का वाला शहर था. शहर में चर्च थे, यहूदियों, पारसियों, हिंदुओं, सिखों और जैन समुदाय के लोगों के धार्मिक स्थल थे.
यानी उस वक्त इस शहर में इन सभी धर्मों के अल्पसंख्यक लोग रहते थे. लेकिन इसके बाद पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद बनी. और कराची में अल्पसंख्यकों के बुरे दिन शुरू हो गए. कराची में ईसाइयों और यहूदियों के धर्म स्थल बंद कर दिए गए. बहुत से जैन और हिंदू मंदिरों को या तो तोड़ दिया गया या फिर उन पर भूमाफियाओं ने कब्ज़े कर लिए. पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर धर्म के आधार पर हिंसा होना कोई नई बात नहीं है. पाकिस्तान में 2012 से 2013 के बीच में सांप्रदायिक हिंसा की कम से कम 200 घटनाएं हुई थीं, जिनमें 700 से ज्यादा लोग मारे गए थे. और आज भी वहां ऐसे अत्याचार लगातार हो रहे हैं.
ये आंकड़े और तमाम तस्वीरें बताती हैं कि पाकिस्तान धार्मिक स्वतंत्रता के लिहाज़ से दुनिया का सबसे बड़ा नर्क है… और ये हालात बदलने के लिए उस पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ाया जाना चाहिए. भारत में इस वक्त संसद का सत्र चल रहा है और हमें लगता है कि सांसदों को ये मुद्दा संसद में उठाना चाहिए ताकि पाकिस्तान पर दबाव पड़े.
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