पापमोचनी एकादशी व्रत चैत्र मासके कृष्णपक्षकी एकादशीको किया जाता है । पौराणिक मान्यताओंके अनुसार चैत्र कृष्ण पक्षकी एकादशी पापोंको नष्ट करनेवाली होती है । स्वयं भगवान श्रीकृष्णने इसके फल एवं प्रभावको अर्जुनके समक्ष प्रस्तुत किया था ।
पापमोचनी एकादशी व्रत साधकको उसके सभी पापोंसे मुक्त कर उसके लिये मोक्षके मार्ग खोलती है । इस एकादशीके दिन भगवान विष्णुजीका पूजन करना चाहिए । यदि कोई व्यक्ति इस पूजाको षोडशोपचारके रुपमें करता है तो इसके शुभ फलोंमें अभिवृद्धि होती है ।
पापमोचनी एकादशी पौराणिक महत्व :
पौराणिक कथाके अनुसार धर्मसंस्थापक भगवान श्रीकृष्ण अर्जुनसे कहा, ‘राजा मान्धाताने एक समय लोमश ऋषिसे जब पूछा कि प्रभु यह बताएं कि मनुष्य जो जाने अनजाने पाप कर्म करता है उससे कैसे मुक्त हो सकता है ? राजा मान्धाताके इस प्रश्नके उत्तरमें लोमश ऋषिने राजाको एक कथा सुनाई कि चैत्ररथ नामक सुन्दर वनमें च्यवन ऋषिके पुत्र मेधावी ऋषि तपस्यामें लीन थे ।
इस वनमें एक दिन मंजुघोषा नामक अप्सराकी दृष्टि ऋषिपर पडी तो वह उनपर मोहित हो गई और उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने हेतु यत्न करने लगी । कामदेव भी उस समय उसी मार्गकी ओर विचरण कर रहे थे कि उनकी दृष्टि अप्सरापर गई और वह उसकी मनोभावनाको समझते हुए उसकी सहायता करने लगे । अप्सरा अपने यत्नमें सफल हुई और ऋषि कामपीडित हो गये ।
कामके वशमें होकर ऋषि भगवान शिवकी तपस्याका व्रत भूल गये और अप्सराके साथ रमण करने लगे । कई वर्षों पश्चात् जब उनकी चेतना जागी तो उन्हें भान हुआ कि वह शिवकी तपस्यासे विरत हो चुके हैं, उन्हें तब उस अप्सरापर अत्यन्त क्रोध हुआ और तपस्या भंग करनेका दोषी जानकर ऋषिने अप्सराको पिशाचनी होनेका श्राप दे दिया । श्रापसे दुःखी होकर वह ऋषिके चरणोंमें गिर पडी और श्रापसे मुक्तिके लिए अनुनय करने लगी ।
अप्सराकी याचनासे द्रवित हो मेधावी ऋषिने उसे विधि सहित चैत्र कृष्ण एकादशीका व्रत करनेके लिए कहा, भोगमें निमग्न रहनेके कारण ऋषिका तेज भी लोप हो गया था; अत: ऋषिने भी इस एकादशीका व्रत किया जिससे उनका पाप नष्ट हो गया । उधर अप्सरा भी इस व्रतके प्रभावसे पिशाच योनिसे मुक्त हो गई और उसे सुन्दर रूप प्राप्त हुआ व स्वर्गके लिए प्रस्थान कर गई ।
पापमोचनी एकादशी व्रत विधि :
पापमोचनी एकादशीके विषयमें भविष्योत्तर पुराणमें वर्णन किया गया है कि इस व्रतमें भगवान विष्णुके चतुर्भुज रूपकी पूजा की जाती है, व्रती दशमी तिथिको एक बार सात्विक भोजन करे और मनसे भोग विलासकी भावनाको निकालकर, भगवान विष्णुकी पूजा अर्चना करनी चाहिए । एकादशीके दिन सूर्योदय कालमें स्नान करके व्रतका संकल्प करना चाहिए संकल्पके उपरान्त षोडषोपचार सहित श्री विष्णुजीकी पूजा करें ।
पूजाके पश्चात् भगवानके समक्ष बैठकर भग्वद् कथाका पाठ अथवा श्रवण करना चाहिए । एकादशी तिथिको जागरण करनेसे कई गुणा पुण्य मिलता है; अत: रात्रिमें भी निराहार रहकर नामजप अथवा भजन-कीर्तन करते हुए जागरण करें । द्वादशीके दिन प्रात: स्नान करके विष्णु भगवानकी पूजा करें तदुपरान्त सात्त्विक ब्राह्मणोंको भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करें, तत्पश्चात् स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए । इस एकादशीसे हमें यह भी सीखना चाहिए कि माया हमें कितना भी आकर्षित करे साधक अथवा ईश्वर प्राप्तिकी इच्छुक जिज्ञासु जीवात्माको अपने लक्ष्यसे नहीं भटकना चाहिए और पूर्वमें हुए अनजाने पापोंके शमन हेतु यह व्रत अवश्य विधिपूर्वक करना चाहिए ।
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