जून ३, २०१९
शिक्षा नीतिके प्रारुपमें हिन्दी सहित ३ भाषाओंका प्रस्ताव रखे जानेका महाराष्ट्रमें भी विरोध होने लगा है । अब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेनाके प्रवक्ताने रविवार, २ जूनको ट्वीटकर कहा कि हिन्दी हमारी मातृभाषा नहीं है । हमपर यह बलपूर्वक थोपी न जाए । इसके पूर्व नई शिक्षा नीतिका तमिलनाडुमें भी विरोध हुआ था ।
तमिलनाडुमें कई राजनीतिक दलोंने कहा था कि हमपर हिन्दी नहीं थोपी जा सकती है । द्रमुक नेता एमके स्टालिनने कहा था कि प्राथमिक विद्यालयसे १२वीं कक्षातक हिन्दी पढाए जानेका प्रस्ताव अचम्भित करनेवाला है और यह देशका विभाजन कर देगा । १९६८ से राज्यमें केवल दो भाषाओंके सूत्रपर शिक्षा नीति चल रही है । तमिलनाडुमें केवल तमिल और अंग्रेजी पढाई जाती है । हिन्दी पढाए जानेको हम कभी स्वीकार नहीं करेंगें ।
केन्द्रीय मन्त्री डीवी सदानन्द गौडाने कहा है कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदीने भी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा और क्षेत्रीय आकांक्षाका नारा दिया है । संसद सदस्योंको सम्बोधित करते हुए सोमवार, ३ जूनको उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय समस्याओंपर पहले ध्यान दिया जाना चाहिए; क्योंकि इससे ही देश आगे बढता है । केवल राजनीतिक उद्देश्योंके लिए केन्द्र शासनके विरुद्घ आवाज उठाना उचित नहीं है ।
मानव संसाधन मन्त्री रमेश पोखरियाल निशंकने कहा कि समितिने अपना ब्यौरा प्रस्तुत किया है । यह कोई नीति नहीं है । लोगोंके परामर्शको ध्यानमें रखा जाएगा ।
शिक्षा नीतिका प्रारुप वैज्ञानिक के.कस्तूरीरंगनने बनाया है । इसमें प्रस्ताव दिया गया कि तीन भाषाओंके सूत्रको पूरे देशमें पारित किए जानेकी आवश्यकता है । शोधमें सामने आया है कि २-८ वर्षकी आयुके बच्चे भाषाएं शीघ्र सीखते हैं । बहुभाषी सूत्र बच्चोंके लिए लाभप्रद हैं; इसलिए बच्चोंको आरम्भसे ही तीन भाषाओंकी शिक्षा दी जाए ।
“यह हमारे लिए लज्जाका विषय है कि देशकी राष्ट्रभाषा हिन्दी, जो सब भाषाओंका मूल है, उसका विरोध कर रहे हैं और बातें हम आकाशको छूनेकी करते हैं । राष्ट्रद्रोही तमिल राजनीतिक दलोंका तो समूचे देशको ज्ञात है; परन्तु मनसे प्रमुखसे इसकी अपेक्षा नहीं थी । क्या उन्होंनें कभी हिन्दीको पढा है ? यदि पढा होता तो उन्हें ज्ञात होता कि मराठी और हिन्दी समान भाषा ही है । उसमें मराठी एक क्षेत्रीय भाषा व हिन्दी व्यापक है । इन नेताओंको चुनाव प्रचार करनेके लिए हिन्दी बोलना है; परन्तु जब बालकोंकी बात आती है तो अंग्रेजी सीखानेकी बातें करते हैं ! हमारी राष्ट्रभाषाके प्रति हमारा यह व्यवहार घृणित है और विभाजनकारी है ।”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : भास्कर
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