चालीस प्रतिशतके नीचेके आध्यात्मिक स्तरके साधकने सन्यास नहीं लेना चाहिए क्योंकि ऐसे व्यक्तिके लिए विषय वासनाको नियंत्रित करना अत्यंत कठिन होता है और यदि ऐसे व्यक्ति योग्य गुरुके शरणमें सन्यास नहीं लेते तो वे अति सहजतासे माया-मोहके चक्रव्यूहमें उलझ जाते हैं और आज समाजमें ऐसे ही गेरुआधारियोंने धर्मके नामपर अनेक व्यभिचार फैला रखा है |
अतः ऐसे व्यक्तिने गृहस्थ आश्रममें प्रवेश कर अपनी इच्छाओंकी पूर्ति करते हुए साधनारत रहनेका प्रयास करना चाहिए | क्योंकि धर्मके नामपर पाखंड फैलानेवालेको ईश्वर सर्वाधिक कठर दंड देते हैं यह ध्यान रहे !
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