कुछ दिवस पूर्व एक युवा संस्कार वर्गका आयोजन किया गया था, वहांपर भोजन करते समय कुछ बच्चोंको आश्रममें भी चम्मचसे प्रसाद (दोपहरका भोजन) करते देख, मैंने उन सबको हाथसे प्रसाद ग्रहण करनेके लिए कहा; क्योंकि आश्रमका भोजन तो स्वर्ग लोकमें भी नहीं मिलता, तो एक बालिकाने, जिसकी मां भी वहीं बैठी भोजन कर रही थीं, कहा कि यदि मैं हाथसे भोजन करती हूं तो मां मुझे डांटती हैं ।
प्रसादमें चैतन्य होता है; अतः उसे चम्मचसे नहीं ग्रहण करना चाहिए एवं हाथकी अंगुलियोंकी पोरोंसे शक्ति प्रवाहित होती है, जो भोजनमें प्रविष्ट होकर उसे सुपाच्य बनाती है एवं चम्मचसे भोजन करनेसे यह लाभ प्राप्त नहीं होता ।
आज हिन्दुओंको धर्म नहीं सिखाया जाता है; अतः उन्हें दैनिक आचरणका शास्त्र ज्ञात नहीं है और इस कारण अधिकांश हिन्दू, हीनभावनासे ग्रसित हो गए हैं । अज्ञानतावश, वे अपने बच्चेको ‘बाबूसाहेब’ और ‘मेमसाहेब’ बनानेके लिए उन्हें तमोगुणी और पैशाचिक पाश्चात्य संस्कृतिका अनुकरण करना सिखाते हैं ।इसलिए तो आज शिवाजी महाराज जैसे दिव्य राष्ट्रभक्त और धर्मरक्षक मांके मार्गदर्शनमें अत्यल्प संख्यामें संस्कारित हो पाते हैं ।
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