घरका वैद्य – मधु (शहद) (भाग-१)


मधु हलका होता है । उदरमें पहुंचते ही तुरन्त पचकर रक्तमें मिश्रित हो जाता है और शरीरमें बलका संचार कर देता है । मधुको जिस भी पदार्थके साथ मिला लिया जाए, उसी प्रकारके प्रभाव दिखाता है अर्थात उष्ण पदार्थके साथ लें तो उष्ण प्रभाव देता है और यदि ठण्डे खाद्यान्नके साथ लें, तो ठण्डा प्रभाव दिखाता है । मधुमें शर्करा समान दाने देखकर उसकी शुद्धतापर सन्देह नहीं करना चाहिए । मधुपर देश, काल और स्थानका प्रभाव पडता है; अतः इसके रंग, रूप और स्वादमें अन्तर रहता है । मधुमें ‘पोटैशियम’ होता है जो रोगके कीटाणुओंका नाश करता है । कीटाणुओंसे होनेवाले रोग, जैसे ‘टाइफाइड’, ‘ब्रांको’, ‘निमोनिया’ आदि अनेक रोगोंके कीटाणु मधुसे नष्ट हो जाते हैं । यदि किसी व्यक्तिकी त्वचा पीली पड गई है तो इसका कारण होता है कि रक्तमें लौहतत्त्वकी न्यूनता । मधुमें लौहतत्त्व अधिक होता है । प्रातः सायं भोजन उपरान्त नींबूके रसमें मधु मिलाकर अथवा दूधमें मधु मिलाकर सेवन करना लाभकारी है ।
मधुमें ५०% ‘ग्लूकोज’, ३७% ‘फ्रुक्टोज’, २०% ‘सुक्रोज’, २०% ‘माल्टोज’ और इतना ही गोंद, मोम, ‘क्लोरोफिल’ और सुगन्धके अंश होते हैं । ‘विटामिन’-‘ए’, ‘बी-6’, ‘बी-12’ और थोडी मात्रामें ‘विटामिन’-‘सी’ भी होता है । मधु खानेमें मीठा लगता है ।



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