मधुको शीतकालमें उष्ण पेयके साथ, ग्रीष्म ऋतुमें ठण्डे पेयके साथ तथा वर्षा ऋतुमें प्राकृतिक रूपसे ही सेवन करना चाहिए । मधुको अग्निपर कभी भी नहीं तपाना चाहिए । अधिक उष्ण पदार्थ मधुमें मिलानेसे मधुका गुण नष्ट हो जाता है; अतः इसे हलके गुनगुने दूध, जलमें ही मिलाना चाहिए । घी, तेल, चिकने पदार्थके साथ सम-मात्रामें मधु मिलानेसे विष बन जाता है; अतः इस बातका सदैव ध्यान रखना चाहिए । मधुके ऐसे मिश्रणको प्रयोगमें नहीं लाना चाहिए ।
* ‘फेफडे’के रोग, जैसे ‘ब्रोंकाइटिस’, ‘निमोनिया’, ‘टीबी’, ‘दमा’ आदिमें मधु लाभदायक है ।
* ‘दमा’ : दुर्बल व्यक्ति जिनके ‘फेफडे’ श्लेष्मासे भरे रहते हैं और श्वास लेना कठिन होता है, उनको दो चम्मच ‘प्याज’का रस या एक ‘प्याज’को कूट-कूटकर गुदा बनाकर इसे दो चम्मच मधुमें मिलाकर सेवन करना बहुत लाभकारी है । ‘फेफडे’का रोग मधु सेवन करनेसे दूर होता है । मधु ‘फेफडों’को बल देता है । खांसी, गलेका शुष्क होना और स्नायु कष्ट दूर होते हैं । केवल मधु भी ले सकते हैं ।
* खांसी : नींबू पानीमें उबालें, काचके पात्रमें एक भाग ‘ग्लिसरीन’ और तीन भाग मधु मिलाकर हिलाएं । एक-एक चम्मच दिनमें चार बार सेवन करनेसे खांसीमें लाभ होता है । मधु खांसीमें लाभ देता है । १० ग्राम मधु सप्ताहभरमें, प्रत्येक दिवस तीन बार चाटनेसे कफ निकल जाता है और खांसी ठीक हो जाती है ।
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