११ मई, २०२१
सर्वोच्च न्यायालयमें १० मई सोमवारको केन्द्र शासनद्वारा प्रस्तुत किए गए एक शपथपत्रमें स्पष्ट रूपसे कहा कि न्यायालय शासनकी ‘कोरोना’ महामारीसे लडनेकी प्रत्येक छोटी-बडी नीतिमें हस्तक्षेप न करे । केन्द्रने कहा कि एक वैश्विक महामारीपर टिप्पणी देनेके लिए विशेषज्ञोंका परामर्श अति आवश्यक है ।
सर्वोच्च न्यायालयद्वारा ३० अप्रैलसे ०६ मईके मध्य केन्द्र शासनसे इस विषयमें कई प्रश्न किए गए थे ।
यद्यपि ‘कोरोना’के कारण चल रही ‘ऑनलाइन’ सुनवाईको कुछ तकनीकी गडबडीके कारण बृहस्पतिवारतक स्थगित कर दिया तथा यह भी कहा कि शासनद्वारा प्रस्तुत किए गए शपथपत्रका विश्लेषण करनेके लिए उन्हें कुछ और समय चाहिए ।
जो कार्य केन्द्र शासनको बहुत पहले करना था, वह उसने अब किया है । न्यायालयका कार्य न्याय करना है, शासन करना नहीं । शासनके कार्यमें अकारण हस्तक्षेपकी वृत्ति न्यायालयोंको परिवर्तित करनी चाहिए । जिन न्यायालयोंकी कार्यप्रणाली ऐसी है कि किसी आरोपीको, एक न्यायालय अपराधी सिद्ध करता है और उसे दूसरा न्यायालय मुक्त कर देता है । ऐसी विसंगति और ‘विवेक’युक्त न्यायालयोंको दही-हांडीकी ऊंचाई दिखती है; परन्तु बंगालकी हिंसा नहीं दिखाई देती । ऐसी न्यायप्रणालीमें आधारभूत परिवर्तनकी आवश्यकता है । केन्द्र शासन इसपर गम्भीरतासे विचार करे ! – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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