५००-६०० नक्सलियोंने रात्रि गांवमें किया प्रवेश, घरसे बलात लाए गए भूमिहार, ३४ की ग्रीवा काटी-उदर विदीर्ण किए : २२ वर्ष पश्चात कोई दोषी नहीं !


२१ मई, २०२१
 बिहारने १९९०के दशकमें कई नरसंहार देखे । यह लालू-राबडीके जंगलराजमें हुआ । जिसका स्मरणकर आज भी लोगोंकी आत्मा कांप जाती हैं । इन नरसंहारोंमेंसे एकका परिणाम सेनारीमें देखनेको मिला था । जहानाबाद जनपदके सेनारी गांवमें १८ मार्च १९९९को ३४ लोगोंकी आतताइयोंने निर्दयतासे हत्या कर दी थी । उस रात्रि प्रतिबन्धित नक्सली सङ्गठन ‘माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर’के आतताइयोंने सेनारी गांवको घेर लिया । ५००-६०० आतताइयोंने रात्रिके समय गांवमें प्रवेश किया था । घरोंसे पुरुषोंको बलात बाहर निकाला गया । उन्हें तीन गुटोंमें विभाजितकर गांवके बाहर ले जाया गया और पंक्तिमें खडाकर क्रमवार सबकी गर्दनें काटी गई और उदर विदीर्ण कर दिए गए ।
 इस नरसंहारमें जिनकी हत्या हुई, वे लोग भूमिहार थे । ३०० घरवाले इस गांवमें ७० भूमिहार परिवार रहते थे । उस समय बिहारने इस प्रकारके कई नरसंहार देखे थे । ऐसे ही एक नरसंहारके कारण १९९८ में राज्यमें राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था; परन्तु कांग्रेसके विरोधके कारण २४ दिवसमें ही पुनः राबडी शासन स्थापित हो गया था ।
 पटना उच्च न्यायालयने २२ वर्ष पश्चात २१ मई २०२१ को इस घटनामें उन सभी १३ लोगोंको दोषमुक्त कर दिया है, जिन्हें निचले न्यायालयने दोषी माना था । अब इस घटनामें कोई भी दोषी नहीं है । ऐसेमें बडा प्रश्न यह है कि मनुष्योंको पशुओंकी भांति काटनेवाले इस नरसंहारका अन्ततः दोषी कौन है ?
     एक न्यायालयने जिन्हें दोषी माना, दूसरेने उन्हें मुक्त कर दिया ! इसका अर्थ है कि न्यायप्रणालीमें ही दोष है । मार्गपर सो रहे निर्दोष लोगोंका और जोधपुरमें कृष्णमृगोंकी हत्या करनेवाला भी आज ऐसी व्यवस्थाकी कृपासे मुक्त है । ऐसी न्यायव्यवस्थाको परिवर्तित करने हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना अपरिहार्य है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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