‘मन्दिरकी प्रतिमा अवयस्क बच्चेके समान, उनके धनकी सुरक्षा हमारी उत्तरदायित्व’, मद्रास उच्च न्यायालयका बडा निर्णय


२९ जून, २०२१

 मद्रास उच्च न्यायालयने कहा है कि मन्दिरकी प्रतिमा एक बच्चेके समान है तथा उसके धनकी सुरक्षा करना हमारा उत्तरदायित्व है । मद्रास उच्च न्यायालयने मन्दिरके प्रतिमाको एक अवयस्क बच्चेके समान बताया । न्यायाधीश आरएमटी टीका रमन तमिलनाडुके पलानी मन्दिरकी भूमिपर अतिक्रमण किए कुछ लोगोंको ‘बेदखल’ करनेका आदेश दिया । ये ऐसे लोग हैं, जिनके परिवार कई वर्षोंसे मन्दिरके धनपर अतिक्रमण करके बैठे हुए थे ।
  मद्रास उच्च न्यायालयने कहा, “नियमके अनुसार मन्दिरकी प्रतिमा एक अवयस्क बच्चेके समान है । न्यायालय उस अवयस्क बच्चेका अभिभावक है, व्यक्तिका भी और सम्पत्तिका भी । न्यायालयको मन्दिरके धनकी ऐसे ही रक्षा करनी है, जैसे अवयस्क बच्चेकी ।” न्यायालयने यह भी कहा कि उक्त मन्दिरको ६० वर्षोंतक उसके धनके प्रयोगसे रोका गया । साथ ही रक्षा पक्ष मन्दिरके धनपर अपना अधिकार दृढ करनेमें असफल रहे ।
      मन्दिरोंकी जितनी उपेक्षा हुई है, सम्भवतः अन्य किसीकी न हुई हो ! कहीं जिहादी व ईसाई लूट रहे हैं, तो कहीं हिन्दू स्वयं लड-मर रहे हैं, तो स्पष्ट है कि अब धर्म संस्थापनाका कार्य आवश्यक हो गया है और न्यायाधीश महोदयको भी बताना चाहेंगे कि मन्दिरकी प्रतिमा ब्रह्मण्डका सञ्चालन करती है । यद्यपि उनका यह कहनेका भाव पवित्र है, क्योंकि वह मन्दिरकी भूमिके रक्षण हेतु है, तो वह स्वीकार किया जा सकता है; परन्तु जिस प्रकार आज न्यायपालिकाकी मन्दिरों व हिन्दू धर्मको लेकर दृष्टिकोण है, उसमें अभिभावकके रूपमें नहीं देख जा सकता है । यद्यपि इस प्रकरणमें न्यायधीश महोदयने जो निर्णय दिया है, वह प्रशंसनीय है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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