‘बिग टेक’ प्रभावित कर रहे लोकतान्त्रिक प्रक्रिया, सर्वोच्च न्यायालयने ‘फेसबुक’को हडकाया
१० जुलाई, २०२१
‘फेसबुक’ यह कहकर अपना पल्ला नहीं झाड सकता कि वह मात्र एक ‘मंच’ है, जो अपने ‘यूजर’के ‘कंटेंट’ ‘पोस्ट’ करता है और इन ‘कंटेंट’ व सूचनाको नियन्त्रित करनेमें अथवा उसे रोकनेमें उसकी कोई भूमिका नहीं है ।”
यह टिप्पणी उच्चतम न्यायालयकी तीन सदस्यीय उस पीठकी है, जिसके सामने ‘फेसबुक’ने देहली विधानसभाकी शान्ति और सामञ्जस्य समितिसे (Peace and Harmony Committee)’ मिले एक ‘समन’को निरस्त करनेकी संस्तुति (सिफारिश) की थी ।
समितिने ‘फेसबुक’को यह ‘समन’ २०२० में हुए देहली उपद्रवोंके सन्दर्भमें उसकी भूमिकाको लेकर भेजा था । न्यायाधीशोंने ‘समन’को निरस्त करनेकी अस्वीकृति देते हुए अपनी टिप्पणीमें कहा, “अपने ‘यूजर’द्वारा ‘पोस्ट’ किए सन्देश व सूचनाको लेकर ‘फेसबुक’की भूमिका और महत्त्वपूर्ण हो जाती है । उसकी भूमिका इतनी भी सरल नहीं है कि वो अपने ‘मंच’पर ‘पोस्ट’ किए जानेवाली सूचनाओंसे स्वयंको पृथक रख सके ।”
इसके अतिरिक्त न्यायालयने लोकतन्त्रमें चुनाव और उससे सम्बन्धित प्रक्रियाओंको प्रभावित करनेमें ‘सोशल मीडिया’, महत्त्वपूर्ण रूपसे ‘फेसबुक’की भूमिकापर बात करते हुए कहा, “आज लोकतान्त्रिक शासनके चुनावकी प्रक्रिया अर्थात मतदानको ‘सोशल मीडिया’द्वारा किए जा रहे हस्तक्षेपके कारण बहुत बडा सङ्कट है और इस कारणसे ‘फेसबुक’ जैसे ’सोशल मीडिया’ मंचोंकी भूमिका और उनके विस्तृत होते क्षेत्रपर सार्वजनिक वाद-विवाद स्वाभाविक हैं ।
भारत स्वतन्त्रताके पश्चातसे ही विदेशी शक्तियोंसे प्रभावित होता आया है; किन्तु अब न्यायालयकी टिप्पणीसे ‘फेसबुक’ एवं ‘ट्विटर’ जैसे तकनीकी षड्यन्त्रकारियोंको स्पष्ट हो जाना चाहिए कि अब यह राष्ट्र किसीके दबावमें आनेवाला नहीं है । हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना हो, इस हेतु कुछ कठोर पग उठाने होंगे, जिसका शुभारम्भ कदाचित हो चुका है ! – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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