‘जन्माष्टमीके दिवस अपने हिन्दू मित्रको मांस खिलाकर मिलती थी शान्ति’, उर्दू लेखिकाने लिखा अपनी आत्मकथामें


२ सिंतबर, २०२१
       उर्दूकी लेखिका इस्मत चुगताईकी जीवनीके कुछ अंशोंको ‘बीबीसी’ने प्रकाशित किया है । अपनी आत्मकथामें उर्दू लेखिकाने रहस्योद्घाटन किया है कि वह किस प्रकारसे अपनी हिन्दू पडोसनके यहांसे भगवान श्रीकृष्णकी मूर्तिको चुराकर ले जा रही थी और जन्माष्टमीके दिवस छलसे अपनी हिन्दू मित्र सुशीको मांस खिलाया करती थी । ‘बीबीसी’द्वारा इस्मतकी आत्मकथा ‘कागजी है पैरहन’के अनुवादके अनुसार उन्हें ज्ञात था कि फल, दालमोठ व ‘बिस्कुट’में कोई छूत जैसा नहीं था; अतः जन्माष्टमीके  दिन वह अपनी मित्रको मांस खिलाती थी, ऐसा करनेसे उन्हें अत्यधिक शान्ति मिलती थी । वहीं ‘बकरीद’के दिन टाटका अहाता बनाकर उसके पीछे बकरे काटे जाते थे । उन दिनों उनकी मित्र सुशीको घरके भीतर बन्द कर दिया जाता था । लेखिकाके अनुसार जन्माष्टमीका पर्व हिन्दुओंमें अत्यधिक धूमधामसे मनाया जाता था । पकवानोंकी सुगन्धके कारण उनका भीतर जानेका उनका मन करता था । उस दिन उन्होंने अपनी मित्रसे पूछा था कि आज क्या है ? जिसपर उनकी मित्रने कहा कि “भगवान आए हैं ।” इसके उपरान्त वह सुशीके आंगनमें आ गई जहां एक महिलाने उनके माथेपर टीका लगा दिया । इसपर आगे इस्मत बताती हैं कि उन्होंने सुना था कि जहां तिलक लगता है, वहांका ‘गोश्त’ ‘जहन्नुम’को जाता है । यह सोचकर उन्होंने उसे मिटानेका प्रयास किया; परन्तु वह इसका लाभ लेकर पूजाघरतक चली गई व चांदीके पालनेमें झूलते भगवानको चुरा लिया इसी मध्य सुशीकी नानीने उन्हें देख लिया और वहांसे बाहर कर दिया ।
       इसमें कोई सन्देह नहीं कि सभी जिहादियोंकी मानसिकता सदैव निम्न श्रेणीकी ही होती है । वह अन्य धर्मके लोगोके विषयमें कदापि विचार नहीं करते एवं उनके उत्पीडन हेतु सदा तत्पर रहते हैं । ऐसे आसुरी पन्थका जितना शीघ्र अभिज्ञान कर पाएंगे, वह हमारे लिए ही उत्तम होगा । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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