गृह मन्त्रालयने निरस्त कीं, ९ अशासकीय सङ्गठनोंके विदेशी योगदान विनियमन अधिनियमकी अनुज्ञप्तियां, ईसाई-इस्लामी समूहोंके अतिरिक्त ‘पेगासस’से भी हैं सम्बन्ध


१३ सितम्बर, २०२१
       अशासकीय सङ्गठनोंकी आडमें चल रहे, ईसाई तथा इस्लामी सङ्गठनोंपर कठोरता दिखाते हुए गृह मन्त्रालयने अबतक इस वर्षमें ९ एवं गत डेढ माहमें ६ सङ्गठनोंके विदेशी वित्त पोषणकी अनुज्ञप्तियोंको निरस्त कर दिया है । प्रतिवेदनके अनुसार, अब केवल २२,७०८ सक्रिय अशासकीय सङ्गठन तथा अन्य सङ्घ पङ्जीकृत हैं ।
       ज्ञात हो कि यह अशासकीय सङ्गठन दीर्घकालसे पूंजीका दुरुपयोग करनेके कारण जांचके घेरे में थे । इससे पूर्व २७ अगस्तको सुन्नी नेता शेख अबूबकर अहमदसे जुडे केरलके ‘मरकज़ुल इघासथिल कैरियाथिल हिंडिया’का  योगदान विनियमन अधिनियमकी अनुज्ञप्तिको निरस्त किया गया था । उन्होंने पूंजीके दुरुपयोग एवं २०१९-२० में वार्षिक ‘एफसीआरए’ ‘रिटर्न’के मध्य तथ्योंको अनुचित रूपसे दर्शाया था । १४६ कोटि (करोड) धनराशि विदेशोंसे प्राप्त हुई थी । ३५ दानदाताओंमें २८ केवल ‘यूएई’ से थे; यद्यपि अन्य ओमान, तुर्की, एवं ब्रिटेन से थे । इस ‘एनजीओ’से पूर्व लखनऊकी ‘अल हस एड्यूकेशन एंड वेल्फेयर ऑर्गेनाइजेशन’ सङ्कट में थी । इसके पश्चात हरियाणाके ‘मेवात ट्रस्ट एड्यूकेशनल वेल्फेयर’की भी अनुज्ञप्ति १८० दिवसके लिए निरस्त हुई थी ।
        ईसाई समूहोंमें ओडिशाकी ‘पीपुल्स ऑर्गेनाइजेशन ऑफ एम्पॉवरमेंट ऑफ ट्राइबल एंड हेवनली ग्रेस मिनिस्ट्रीज’ एवं मदुरईकी ‘रुश फाउंडेशन’को निलम्बित किया गया था । इसके पश्चात बेंगलुरु स्थित ‘सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज’ एवं आंध्र प्रदेशसे बाहर सञ्चालित होनेवाला ‘मिशनरी’ सङ्गठन ‘होली स्पिरिट मिनिस्ट्रीज’ सम्मिलित है ।
        ज्ञात हो कि गृह मन्त्रालयद्वारा जिन ‘एनजीओ’के ‘एफसीआरए’के अनुमोदन निलम्बित हुए हैं, उनमें ‘कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव’ (सीएचआरआई) नामक ‘एनजीओ’ भी सम्मिलित है। ‘सीएचआरआई’ का एक सदस्य मदन लोकुर भी है, जिन्हें बंगाल शासनने कथित ‘पेगासस जासूसी’ प्रकरणमें जांचके लिए गठित आयोगका नेतृत्व करनेके लिए कहा था । मदन लोकुर ‘सीएचआरआई’की कार्यकारी समितिके सदस्य हैं । ये एक ऐसी संस्था है, जिसे वर्ष २०२१ में अमेरिकाके विदेश विभाग (अमेरिकी दूतावास), नई देहलीमें ब्रिटिश उच्चायोग तथा कनाडाके उच्चायोगसे व्यापक योगदान मिला । ‘यूएस’की ओरसे इस संस्थाको किए गए योगदानका उद्देश्य भारतके उत्तर पूर्वी राज्योंमें ‘बन्दियों’के लिए अभियोग एवं ‘आउटरीच कार्यक्रम’ चलाना था । ‘यूके’के लिए ये भारतमें न्यायकी गतिपर शोध तथा विदेशी राष्ट्रीय बन्दियों तथा अपराधसे पीडित लोगोंपर उनका प्रभाव जानने के लिए था । वहीं, कनाडाके लिए योगदान “Reimbursement of Expenditure” के उद्देश्य से था । इनके अतिरिक्त, ‘सीएचआरआई’को ‘केलिडोस्कोप डायवर्सिटी ट्रस्ट, फ्रेडरिक नौमैन स्टिफ्टंग-जर्मनी’, ‘द हैन्स सीडल फाउंडेशन’ एवं अन्योंसे भी योगदान मिला है ।
       ‘एनजीओ’के नामपर विदेशी धनसे धर्मान्तरण करानेके षड्यन्त्रको विफल करने हेतु यह आवश्यक है; अतः इस कार्य हेतु केन्द्र शासनकी प्रशंसा की जानी चाहिए; परन्तु इतना पर्याय नहीं है । केन्द्र शासन अपने नियमोंको और भी कठोर बनाकर, ऐसी सभी संस्थाओंपर अंकुश लगाए ! – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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