धर्मदास व साध्वी अन्नपूर्णाके दुष्कर्मियोंको मृत्युदण्ड देनेके वक्तव्योंको विकृत व व्यर्थकी चर्चा (बतंगड) बनाकर परिवादकर्ताद्वारा प्रस्तुत किया गया


२६ दिसम्बर, २०२१
        उत्तराखण्डके हरिद्वारमें आयोजित हुए धर्म संसदमें एक समुदाय विशेषको लेकर दिए गए वक्तव्यको लेकर विवाद बढता जा रहा है । इस प्रकरणमें जितेंद्र नारायण त्यागीके पश्चात साध्वी अन्नपूर्णा और सन्त धर्मदासके विरुद्ध प्रकरण प्रविष्ट किया गया है । हरिद्वारके ज्वालापुर निवासी गुलबहार खांंने जितेंद्र नारायण त्यागी और अज्ञातके विरुद्ध कोतवाली ‘थाने’में धार्मिक उन्माद फैलानेका आरोप लगाते हुए परिवाद प्रविष्ट किया था । ‘पुलिस’ महानिदेशक अशोक कुमारने कहा कि जितेंद्र नारायणके वक्तव्यसे किसीकी हत्या या हिंसा नहीं हुई; इसलिए इस प्रकरणमें ‘यूएपीए’ अधिनियम क्रियान्वित नहीं होता है । इस प्रकरणमें ‘पुलिस’द्वारा जांचकी जा रही है ।
        वहीं सन्त धर्मदास और साध्वी अन्नपूर्णाकी भी भूमिका सामने आई है और उनके विरुद्ध प्रकरण प्रविष्ट कर लिया गया है । धर्म संसदमें सम्मिलित हुए आनंद स्वरूपने कहा कि वे अपने वक्तव्योंपर अडिग है । उन्होंने कहा कि उनके विचार सुविचारित हैं । यदि कोई बहन-बेटियोंसे दुष्कर्म करे, तो क्या उसे जीवित रहनेका अधिकार है ? वक्ताओंने दुष्कर्मियोंको मृत्युदण्ड देनेका वक्तव्य दिया था, न कि सामान्य मुसलमानोंके सन्दर्भमें ।
       दुष्कर्मियोंको त्वरित मृत्युदण्ड देकर समाजकी व कुटुम्बकी रक्षा करनेका सर्व सामान्य विधान तो प्राणी जगतमें भी स्वतः ही पालन किया जाता है । साधु-सन्तोंके उक्त वक्तव्य प्रकृतिके सर्व सामान्य विधानका ही बोध करा रहे हैं । सभी हिन्दुओंको इनके समर्थनमें आना चाहिए । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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