सत्यं नामाव्ययं नित्यमविकारि तथैव च ।
सर्वधर्माविरद्धेन योगेनैतदवाप्यते ॥
अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरको सत्यके लक्षण बताते हुए कहते हैं : नित्य एकरस, अविनाशी और अविकारी होना ही सत्यका लक्षण है, समस्त धर्मोंके अनुकूल कर्तव्य पालनरूप योगके द्वारा इस सत्यकी प्राप्ति होती है ।
परिच्छिद्यैव कामानां सर्वेषां चैव कर्मणां ।
मूलं बुद्धीन्द्रियग्रामं शकुन्तानिव पञ्जरे ॥
अर्थ : बुद्धि और इन्द्रियां ही समस्त कामनाओं और कर्मोंकी मूल हैं । उन्हें पिंजरेमें बन्द पक्षियोंकी भांति अपने नियन्त्रणमें रखा जाए तो कोई भय नहीं है ।
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