वास्तविकतामें हिन्दू सबसे अधिक नहीं, उच्च न्यायालयने ‘क्रिप्टो ईसाई’का उल्लेख करते हुए कहा, “आरक्षणके लिए ईसाई भी स्वयंको बताते हैं हिन्दू”


०८ जनवरी, २०२२
      देशमें दीर्घ कालसे ‘क्रिप्टो ईसाई’पर वाद-प्रतिवाद चल रहा है । अनुसूचित जातिसे आनेवाले ये ऐसे लोग होते हैं, जो धर्मान्तरणकर ईसाई बन जाते हैं; किन्तु आरक्षणका लाभ लेनेके लिए स्वयंको प्रलेखोंमें हिन्दू बताते रहते हैं । अब मद्रास उच्च न्यायालयने भी इस ओर ध्यान आकर्षित किया है । ईसाई ‘पादरी’ जॉर्ज पोन्नैयासे जुडे एक प्रकरणकी सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथनने यह बात कही ।
       वास्तवमें पादरीने भारत माता और भूमा देवीको लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी । इसको लेकर उसपर प्राथमिकी प्रविष्ट की गई । इसे निरस्त करनेको लेकर उसने उच्च नयायालयका द्वार खटखटाया था । उच्च न्यायालयने उसकी छूटको अस्वीकार करते हुए अपने निर्णयमें कन्याकुमारीकी जनसांख्यिकीमें परिवर्तनका भी उल्लेख किया । ‘पादरी’ पोन्नैयाने यहीं हिन्दू भावनाओंको आहत करनेवाली टिप्पणी की थी ।
      न्यायमूर्ति स्वामीनाथनने अपने निर्णयमें संकेत किया कि वास्तविकतामें कन्याकुमारी जनपद ईसाई बहुल जनसंख्यामें परवर्तित हो चुका है । उन्होंने कहा, “धार्मिक रूपसे कन्याकुमारीकी जनसांख्यिकीमें परिवर्तन देखा गया है । १९८० के पश्चातसे जनपदमें हिन्दू बहुसंख्यक नहीं रहे । यद्यपि २०११ की जनगणना बताती है कि ४८.५% जनसंख्याके साथ हिन्दू सबसे बडे धार्मिक समूह हैं; किन्तु यह वास्तविकता इससे पृथक हो सकती है । इसपर ध्यान दिया जाना चाहिए कि बडी संख्यामें अनुसूचित जातिके लोग धर्मान्तरणकर ईसाई बन चुके हैं; किन्तु आरक्षणका लाभ पानेके लिए स्वयंको हिन्दू बताते रहते हैं ।
       जिस धर्मकी नींव ही असत्यपर आधारित हो वह धर्म कैसे हो सकता है ? ईसाई पन्थके धूर्त ‘पादरी’ निर्धन लोगोंको यह प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तित कराते हैं कि उनकी निर्धनता दूर हो जाएगी; किन्तु दूसरे ही क्षण मिथ्या अभिज्ञानपर आरक्षणका लाभ लेनेके प्रलेखोंमें हिन्दू बने रहनेके लिए कहते हैं । आवश्यकता है इन ‘क्रिप्टो ईसाइयों’ और इनके तथाकथित धर्मगुरुओंकोके असत्यको प्रत्येक मंचपर प्रदर्शित किया जाए और आरक्षणका लाभ लेनेसे रोका जाए ! – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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