अर्थसिद्धिं परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत् ।
न हि धर्मादपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम् ॥
अर्थ : धृतराष्ट्रसे विदुर कहते हैं : जो अर्थकी पूर्ण सिद्धि चाहता हो, उसे पहले धर्मका ही आचरण करना चाहिए । जैसे स्वर्गसे अमृत दूर नहीं होता, उसी प्रकार धर्मसे अर्थ पृथक नहीं होता ।
अतिमानोsतिवादश्च तथात्यागो नराधिप ।
क्रोधश्चात्मविधित्सा च मित्रद्रोहश्च तानि षट् ॥
एत एवासयस्तीक्ष्णा कृन्तन्त्यायूंषि देहिनाम् ।
एतानि मानवान् घ्नन्ति न मृत्युर्भद्रमस्तु ते ॥
अर्थ : धृतराष्टद्वारा पूछनेपर कि वेदोंके अनुसार आयु सौ वर्षकी है तब भी पुरुष पूर्ण आयु क्यों नहीं पाता ? विदुर बताते हैं : राजन् ! आपका कल्याण हो । अत्यन्त अभिमान, अधिक बोलना, त्यागका अभाव, क्रोध, अपना ही पेट पालनेकी चिन्ता और मित्रद्रोह, ये छह तीक्ष्ण खड्ग (तलवारें) देहधारियोंकी आयुको काटती हैं । ये ही मनुष्योंका वध करती हैं, मृत्यु नहीं ।
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