शास्त्र वचन


दुःखमेवास्ति न सुखं तस्मात् तदुपलभ्यते ।

तृष्णार्तिप्रभवं दुःख दुःखार्तिप्रभवं सुखम् ॥

अर्थ : महर्षि व्यास, युधिष्ठिरसे कहते हैं : संसारमें केवल दुःख ही है, सुख नहीं है, अतः दुःख ही उपलब्ध होता है । तृष्णाजनित पीडासे दुःख और दुःखकी पीडासे सुख होता है अर्थात दुःखसे आर्त हुए मनुष्यको ही उसके न रहनेपर सुखकी प्रतीति होती है ।

यदतप्तं प्रणमति न तत् संतापयन्त्यपि ।

यच्च स्वयं नतं दारु न तत् संनमयन्त्यपि ॥

अर्थ : विदुर, धृतराष्ट्रसे कहते हैं : जो धातुएं बिना तपाए मुड जाती हैं, उन्हें आगमें नहीं तपाते । जो काठ स्वयं झुका होता है, उसे कोई झुकानेका प्रयत्न नहीं करता अर्थात मनुष्यको विनम्र होना चाहिए ।



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