देहली उच्च न्यायालयमें घसीटे जानेपर ‘ट्विटर’ने पत्रकार आरती टिक्कूका खाता किया पुनः प्रारम्भ
१४ जनवरी, २०२२
टिक्कूने १५ दिसम्बरको ‘ट्विटर’पर मुसलमान आतङ्कियोंद्वारा उसके भाईको मार डालनेकी धमकी दिए जानेको लेकर ‘पोस्ट’ साझा किया था । उन्होंने ‘ट्वीट’ किया था, “मेरे भाईको, जो श्रीनगरमें रहते हैं, उन्हें, भारतके कश्मीरमें बैठे जिहादी आतङ्कवादियों और पाकिस्तान, ब्रिटेन और अमेरिकामें उनके ‘आकाओं’द्वारा स्पष्ट रूपसे धमकी दी जा रही है । क्या कोई देख रहा है ? क्या हम इन ‘इस्लामवादियों’द्वारा मारे जानेकी प्रतीक्षा कर रहे हैं या आप उनपर कोई कार्यवाही करेंगे ?”
उसके दो दिन पश्चात, १७ दिसम्बरको ‘ट्विटर इंडिया’ने आरती टिक्कूके खातेको बन्द कर दिया । ‘ट्विटर’ने आरतीको सूचना भेजकर लिखा था कि यदि वह अपने भाईको मिलनेवाली धमकीसे सम्बन्धित ‘पोस्ट’को हटाती हैं तो उनका खाता खोला जा सकता है ।
इस घटनाके पश्चात ६ जनवरीको टिक्कूने ‘ट्विटर’के निर्णयको निरस्त करनेकी मांग करते हुए देहली उच्च न्यायालयमें निवेदन किया था । इसमें उन्होंने कहा कि संविधानके अन्तर्गत, उनके अधिकारोंका उल्लङ्घन हुआ है । याचिकामें आरोप लगाया गया कि ‘ट्विटर’ उनके खातेको बन्दकर मुसलमान आतङ्कवादियोंका पक्ष ले रहा है । अधिवक्ता मुकेश शर्माके माध्यमसे प्रविष्ट याचिकामें कहा गया है कि टिक्कूके भाईको कुछ लोगोंद्वारा लक्ष्य बनाया गया था ।
देहली उच्च न्यायालयने ‘ट्विटर’ और शासनको उनके खातेको बन्द करनेके निर्णयको लेकर समन भेजा गया । न्यायाधीश रेखा पल्लीने इस प्रकरणपर तीन सप्ताहका समय देते हुए केन्द्र और ‘ट्विटर इंक’से भी स्पष्टीकरण मांगा, तो न्यायालयमें घसीटे जानेके भयसे, ट्विटरने आरती टिक्कूका खाता पुनः प्रारम्भ कर दिया ।
ट्विटर अपने वामपन्थी पूर्वाग्रहके लिए कुख्यात रहा है । वह वामपन्थियों और मुसलमान कट्टरपन्थियोंके षड्यन्त्रको चलने देता है; परन्तु दक्षिणपन्थी लोगोंके छोटे-छोटे वक्तव्योंपर उनके खाते बन्द कर देता है; किन्तु अपने अधिकारोंके लिए सङ्घर्ष करनेपर तो ‘ट्विटर’ भी स्वयंके निर्णय पलटनेपर विवश हो जाता है । केन्द्र शासनद्वारा ‘ट्विटर’पर प्रतिबन्ध अथवा कठोर नियम लगाने चाहिए । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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