यच्च कामसुखं वोके यच्च दिव्यं महत् सुखम् ।
तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् ॥
अर्थ : राजा सेनजित एवं ब्राह्मण संवादमें ब्राह्मण कहते हैं : संसारमें जो कुछ इस लोकके भोगोंका सुख है और जो स्वर्गका महान सुख है, ये दोनों तृष्णाक्षयसे (लौकिक जगतकी कामना या इच्छाके नाश) होनेवाले सुखकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं ।
यद् दुरापं भवेत् किंचित तत् सर्वं तपसो भवेत् ।
ऐश्वर्यमृषयः प्राप्तास्तपसैव न संशयः ॥
अर्थ : भीष्म, युधिष्ठिरसे कहते हैं : संसारमें जो कुछ भी दुर्लभ वस्तु हो, वह सब तपस्यासे सुलभ हो सकती है । ऋषियोंने तपस्यासे ही अणिमा आदि अष्टविध ऐश्वर्यको प्राप्त किया है । इसमें संशय नहीं ।
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