धर्मान्धोंके तुष्टीकरणके लिए कल्याणके दुर्गाडी दुर्गपर देवालयकी वास्तुका निर्णय होकर भी वहां ‘नमाज’की अनुमति
२९ जनवरी, २०२२
ठाणेके कल्याण स्थित शिवकालीन दुर्गाडी दुर्गपर छत्रपति शिवाजी महाराजद्वारा निर्मित श्रीदुर्गादेवीका देवालय है; किन्तु उसके पीछे धर्मान्धों द्वारा प्रतिवाद किया जा रहा है कि वह ‘ईदगाह’ है । वर्ष १९६८ में कल्याणके कुछ धर्मान्धोंने यहांका श्री दुर्गादेवीका देवालय ‘मस्जिद’ होनेका प्रतिवाद किया था । जांचके उपरान्त जनपदाधिकारीने दुर्गाडी दुर्गपर स्थित वास्तु देवालय ही होनेका निर्णय दिया; परन्तु धर्मान्धोंके लिए वर्षमें २ बार देवालयकी पिछले क्षेत्रमें ‘नमाज’ पढनेकी अनुमति दी । अब ‘नमाज’पठन होनेके कारण उस अवधिमें ‘पुलिस’ प्रशासन दुर्गपर उत्सव मनानेसे हिन्दुओंको ही रोक रहे हैं, साथ ही दुर्गके आधे क्षेत्रपर हिन्दुओंको प्रवेशबन्दी भी की गई है । २२ मार्च १९७३ को तत्कालीन राजस्वमन्त्री भाऊसाहेब वर्तकने दुर्गाडी दुर्गपर स्थित वास्तु देवालय होनेका स्पष्ट किया था और इस वास्तुको देवालयके रूपमें उपयोग करनेकी हिन्दू समाजकी परम्परा होनेकी बात बताई थी ।
वर्तमान समयमें देवालयकी पिछली भित्तिके स्थानपर ‘बकरी ईद’ और ‘रमजान ईद’के दिन धर्मान्ध दुर्गपर ‘नमाज’ पढनेके लिए आते हैं, उस समय हिन्दुओंको देवालयमें प्रवेश नहीं दिया जाता । तब देवालयके पुजारीको भी ‘पुलिस’ देवालयमें नहीं जाने देती । देवालयकी घण्टी भी बांध दी जाती है । पिछले ४० से अधिक वर्षाेंसे इस भित्तिवाले दुर्गके आधे क्षेत्रमें हिन्दुओंको प्रवेशबन्दी की गई है ।
देवालयके सन्दर्भमें ठोस ऐतिहासिक प्रमाण होते हुए भी धर्मान्ध वहां ‘मस्जिद’ होनेका प्रतिवाद करते हैं और शासन भी उन्हें प्रसन्न रखने हेतु ‘ईद’पर हिन्दुओंको ही देवालयमें प्रवेश करनेसे वंचित रखते हैं । इतिहास साक्षी है कि अनेक मस्जिदें, देवालयोंको तोडकर बनाई गई हैं । अतः क्या अब यह धर्मान्धोंका दुर्ग जिहाद है ? यह केवल ठाणेके दुर्गका प्रकरण नहीं है, भारत में अनेक ऐसे मन्दिर हैं, जहां मुसलमानोंने इस प्रकार अतिक्रमण किया हुआ है । भारत शासन विधान बनाकर, ऐसे सभी स्थलोंको हिन्दुओंको सौंपे, यह मांग सभी हिन्दू शासनसे करें ! – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
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