न बुद्धिर्धनलाभाय न जाड्यमसमृद्धये ।
लोकपर्यायवृत्तान्तं प्राज्ञो जानाति नेतरः ॥
अर्थ : राजा सेनजित एवं ब्राह्मण संवादके अन्तर्गत ब्राह्मण कहते हैं : न तो बुद्धि धनकी प्राप्तिमें कारण है, न मूर्खता निर्धनतामें, वास्तवमें संसारचक्रकी गतिका वृत्तान्त कोई ज्ञानी पुरुष ही जान पाता है, दूसरा नहीं ।
मृदुना दारुणं हन्ति मृदुना हन्त्यदारुणम् ।
नासाध्यं मृदुना किंचित् तस्मात् तीव्रतरं मृदु ॥
अर्थ : प्रह्लादजी बलिसे क्षमाके विषयमें बताते हुए कहते है : मनुष्य कोमल भावके द्वारा उग्र स्वभाव तथा शान्त स्वभावके शत्रुका भी नाश कर देता है । मृदुतासे कुछ भी असाध्य नहीं । अतः मृदुतापूर्ण नीतिको तीव्रतर (उत्तम) समझे !
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