‘कोई नागा साधु महाविद्यालयमें (कॉलेजमें) प्रवेशको लेकर बिना वस्त्रोंके आए तो ?’ विद्यालय-महाविद्यालयोंमें समान गणवेशके (कॉमन ड्रेस कोडके) लिए सर्वोच्च न्यायालयमें आवेदन


१३ फरवरी, २०२२
      कर्नाटकसे उठे ‘हिजाब’ विवादने समूचे देशमें राजनीतिक द्वन्द्व चल रहा है । इस मध्य एक ‘लॉ स्टूडेंट’ने सर्वोच्च न्यायालयमें जनहित आवेदन (पीआईएल) प्रविष्टकर समूचे देशके शैक्षणिक संस्थानोंके लिए समान गणवेश (ड्रेस कोड) क्रियान्वित करनेकी मांग की है ।
      आवेदनकर्ता निखिल उपाध्यायने जनहित याचिकामें कहा है कि देशमें समानता और लोकतान्त्रिक मूल्योंको बचाए रखनेके लिए समान गणवेश बहुत ही आवश्यक है । समान गणवेश ही एक मात्र उपाय है, जिससे जातिवाद, साम्प्रदायिकता और ‘अलगाववाद’से निवृत्त हुआ जा सकता है ।
      निखिल उपाध्यायने अपने आवेदनमें ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, चीन और सिंगापुर जैसे देशोंका उदाहरण देते हुए प्रतिवाद (दावा) किया कि इन देशोंमें समान गणवेश क्रियान्वित हैं और इसी प्रकारसे भारतमें इसे क्रियान्वित करना होगा । एक गणवेशसे समानता बढेगी और इससे देशके लोकतन्त्रका ‘ताना-बाना’ और अधिक सशक्त होगा ।
       ‘हिजाब’के विवादको उठाते हुए निखिलने आवेदनमें नागा साधुओंका उदाहरण दिया और कहा कि यदि कभी महाविद्यालयमें प्रवेश लेकर कोई नागा साधु अपनी धार्मिक परम्पराओंका उदाहरण देते हुए बिना वस्त्रोंके महाविद्यालय चला जाएगा तो क्या होगा ? आवेदनमें कहा गया है कि विद्यालय-महाविद्याल राष्ट्र निर्माण, आजीविका और ज्ञानके लिए होते हैं । निखिलने केन्द्र व राज्योंको सभी शिक्षण संस्थानोंमें समान गणवेश क्रियान्वित करनेके लिए निर्देश देनेकी भी मांग की है ।
       विधि छात्र निखिलने अपनी बात रखनेके लिए जो तर्क दिया है, वह योग्य नहीं है । समान गणवेशका नियम आज भी लागू है, केवल उसका कठोरतासे क्रियान्वन करानेकी आवश्यकता है;  किन्तु नागा साधुओंका उदाहरण देना, एक प्रकारसे नागा साधु परम्पराका उपहास है; क्योंकि वे नागा साधु समाजमें जब आते हैं तब, समाज मर्यादाके कारण सामान्यतः वस्त्र धारण करते हैं । यदि वे विद्यालय जाएंगे तो भी वस्त्र या निर्धारित गणवेश ही धारण करेंगे; क्योंकि सनातन संस्कृति उन्हें ही नहीं, हम सभीको, देशके नियम पालन करनेकी प्रेरणा देती है; अतः ऐसे कुतर्कोंसे बचते हुए, समान गणवेशपर ही चर्चा करनी चाहिए ! जिन्हें यह नियम स्वीकार नहीं है, वे विद्यालय छोडनेको स्वतन्त्र हैं ! – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


सूचना: समाचार / आलेखमें उद्धृत स्रोत यूआरऍल केवल समाचार / लेख प्रकाशित होनेकी तारीखपर वैध हो सकता है। उनमेंसे ज्यादातर एक दिनसे कुछ महीने पश्चात अमान्य हो सकते हैं जब कोई URL काम करनेमें विफल रहता है, तो आप स्रोत वेबसाइटके शीर्ष स्तरपर जा सकते हैं और समाचार / लेखकी खोज कर सकते हैं।

अस्वीकरण: प्रकाशित समाचार / लेख विभिन्न स्रोतोंसे एकत्र किए जाते हैं और समाचार / आलेखकी जिम्मेदारी स्रोतपर ही निर्भर होते हैं। वैदिक उपासना पीठ या इसकी वेबसाइट किसी भी तरहसे जुड़ी नहीं है और न ही यहां प्रस्तुत समाचार / लेख सामग्रीके लिए जिम्मेदार है। इस लेखमें व्यक्त राय लेखक लेखकोंकी राय है लेखकद्वारा दी गई सूचना, तथ्यों या राय, वैदिक उपासना पीठके विचारोंको प्रतिबिंबित नहीं करती है, इसके लिए वैदिक उपासना पीठ जिम्मेदार या उत्तरदायी नहीं है। लेखक इस लेखमें किसी भी जानकारीकी सटीकता, पूर्णता, उपयुक्तता और वैधताके लिए उत्तरदायी है।

विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution