‘द कश्मीर फाइल्स’के ‘ट्रेलर’से चोटिल होती हैं मुसलमानोंकी धार्मिक भावनाएं, चलचित्रका प्रदर्शन रोकने हेतु परिवाद


४ मार्च, २०२२
                  जम्मू-कश्मीरमें १९९० के दशकमें कश्मीरी पण्डितोंके संग हुई क्रूरता, उनका कश्मीरसे विस्थापन, इस विषयपर विवेक अग्निहोत्रीका चलचित्र प्रकाश डालता है । उन्हें कट्टरपन्थियोंकी ओरसे धमकियां तो मिल ही रही थीं, अब मुम्बई उच्चन्यायालयमें किसी इंतजार हुसैन नामक व्यक्तिने उनके चलचित्रके प्रदर्शनको रोकनेके लिए याचिका प्रस्तुत की है । उसका मत है कि इसका ‘ट्रेलर’ देखकर ही वह व्यथित है । इसमें प्रस्तुत हिंसक दृश्य मुसलमान समुदायकी धार्मिक भावनाएं चोटिल करेंगे; क्योंकि इसमें जातिगत भेदभावपूर्ण टिप्पणियां की गई हैं ।
        इस जनहित याचिकामें कहा गया है कि इसके ‘ट्रेलर’में भित्तिपर ‘मुसलमानों जागो, काफिरों भागो’ जैसे वाक्य लिखे हुए हैं, जो हिन्दू-मुसलमानोंके मध्य साम्प्रदायिक असन्तुलन बनाएंगे । संविधानके अनुच्छेद १९ (२) के अन्तर्गत कोई व्यक्ति दूसरेके मौलिक अधिकारोंका उल्लङ्घन करते हुए अपने मौलिक अधिकारोंका प्रयोग नहीं कर सकता ।
                विवेक अग्निहोत्रीने ‘ट्विटर’पर इसका उत्तर देते हुए लिखा है कि इतने छोटेसे दृश्यपटसे भयभीत हो गए ? उन्होंने लिखा कि वे परिवादकर्ताकी रुचि अनुसार किसीभी न्यायालयमें जाकर यह सिद्ध करनेको उद्यत हैं कि उनके चलचित्रकी एक एक घटना सत्य है ।
      लाखों कश्मीरी पण्डित कश्मीरसे निर्दयतापूर्वक भगा दिए गए, अनेककी निर्मम हत्या हुई । महिलाओंसे दुष्कर्म एवं हत्याएं हुईं । आज भी वे मातृभूमिसे दूर विस्थापित जीवन यापनको विवश हैं । यह सत्य कहनेसे धार्मिक भावनाएं चोटिल होती हैं ? अत्याचार करते कुछ नहीं लगा ? सत्य छुपा लेनेसे परिवर्तित नहीं होता है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 


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