शास्त्र वचन


अव्यक्तस्येह  विज्ञाने नास्ति तुल्यं निदर्शनम् ।

यत्र नास्ति पदन्यासः कस्तं विषयमाप्नुयात् ॥

अर्थ : मनु, बृहस्पतिसे कहते हैं – उस अव्यक्त ब्रह्मका बोध करानेके लिए इस संसारमें कोई योग्य दृष्टान्त नहीं             है । जहां वाणीका व्यापार ही नहीं है, उस वस्तुको  कौन वर्णनका विषय बना सकता है ?

*****

नैर्गुण्याद् ब्रह्म चाप्नोति सगुणत्वान्निवर्तते ।

गुणप्रचारिणी      बुद्धिर्हुताशन     इवेन्धने ॥

अर्थ : मनु, बृहस्पतिसे कहते हैं – जैसे अग्नि सूखे काठमें विचरण करती है, उसी प्रकार बुद्धि भी शब्द,  स्पर्श आदि गुणोंमें विचरती रहती है । जब वह उन गुणोंका सम्बन्ध छोड देती है, तब निर्गुण होनेके कारण ब्रह्मको प्राप्त होती है और जबतक गुणोंमें आसक्त रहती  है, तबतक गुणोंसे सम्बन्धित होनेके कारण ब्रह्मको न   पाकर लौट आती है



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2021. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution