अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं दृव्यसंचयः ।
आरोग्यं प्रियसंवासो गृध्येत् तत्र न पण्डितः ॥
अर्थ : मनु, बृहस्पतिसे कहते हैं – यौवन, रूप, जीवन, धन-संग्रह, आरोग्य और प्रियजनका समागम ये सब अनित्य हैं । विवेकशील पुरुषोंको इनमें आसक्त नहीं होना चाहिए ।
यथाम्भसि प्रसन्ने तु रूपं पश्यति चक्षुषा ।
तद्वत्प्रसन्नेन्द्रियत्वाज्ज्ञेयं ज्ञानेन पश्यति ॥
अर्थ : मनु, बृहस्पतिसे आत्मा एवं परमात्माके साक्षात्कारका उपाय बताते हुए कहते हैं, “जिस प्रकार मनुष्य स्वच्छ और स्थिर जलमें नेत्रोंद्वारा अपना प्रतिबिम्ब देखता है, वैसे ही मन सहित इन्द्रियोंके शुद्ध एवं स्थिर हो जानेपर वह ज्ञानदृष्टिसे ज्ञेयस्वरूप आत्माका साक्षात्कार कर सकता है ।
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