‘मदरसों’को न बनने दिया जाए सामान्य विद्यालय, मो इमामुद्दीनने असम शासनके विरुद्धके सर्वोच्च न्यायालयका द्वार खटखटाया, उच्च न्यायालयके निर्णयको दी चुनौती
३१ मई, २०२२
असममें ‘मदरसों’को विद्यालयमें परिवर्तित करनेवाले निर्णयके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालयोंमें याचिका प्रविष्ट की गई है । शीर्ष न्यायालयमें गुवाहाटी उच्च न्यायालयके उस निर्णयको चुनौती दी गई है, जिसमें उन्होंने असम शासनके निर्णयको यथावत रखा था । इस वर्ष फरवरीमें उच्च न्यायालयने ‘असम रिपीलिंग एक्ट २०२०’को यथावत रखते हुए कहा था कि असमके सभी ‘गवर्नमेंट-फंडेड’ ‘मदरसे’ विद्यालयमें परिवर्तित किए जाएं ! मोहम्मद इमादुद्दीन बरभुइया व अन्य लोगोंने अपनी याचिकामें उच्च न्यायालयके इसी आदेशपर रोक लगानेकी मांंग की है । याचिकामें कहा गया है कि निरसन अधिनियम और उसके पश्चातके शासकीय आदेशोंने भारतीय संविधानके अनुच्छेद २५, २६, २८ और ३० के अन्तर्गत याचिकाकर्ताओंके मौलिक अधिकारोंका उल्लङ्घन किया है ।
प्रतिवेदनके अनुसार इस याचिकामें कहा गया है कि २०२० का निरसन अधिनियम ‘मदरसा’ शिक्षाकी वैधानिक मान्यता और सम्पत्तिको छीन रहा है । राज्यपालका १२ फरवरी २०२१ को प्रस्तुत आदेश १९५४ में बनाए गए ‘असम राज्य मदरसा बोर्ड’को भंग कर देता है । यह ‘मदरसों’को धार्मिक शिक्षा प्रदान करनेसे रोकनेके लिए विधायी और कार्यकारी शक्तियोंकी मनमानी है।
‘मदरसा’ शिक्षण पद्धतिसे समूचा विश्व चिर-परिचित है; इसी कुशिक्षा व्यवस्थाने भारतवर्षको खण्डितकर पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान जैसे क्षेत्र भू-भार बन समस्त धराके लिए त्रासदी बने हुए हैं । भारतवर्षके उत्कर्ष और सुरक्षाकी दृष्टिसे ‘मौलवियों’ व ‘मदरसों’के सर्व मौलिक अधिकार, ‘कानूनी’ आधार व शिक्षण व्यवस्था प्रतिबन्धित करना ही उचित है । हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना व दिव्य संचालनके लिए क्या-क्या करना योग्य होगा ?, इस दिशामें न्याय व्यवस्था सन्तोंसे मार्गदर्शन ले, अधिकाधिक समय इस दिशामें चिन्तनकर कार्य योजना निकाले, इसीमें हितमें निहित है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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