जय जय देवि चराचरसारे कुचयुगशोभित मुक्ताहारे ।
वीणापुस्तकरंजितहस्ते भगवति भारति देवि नमस्ते |।।
अर्थ : उन देवी सरस्वतीको वंदन है जो चराचरका सार है, जिनका गलेमें मोतियोंके हार सुशोभित है, जिन्होंने वीणा और वेद धारण कर रखा है और जिन्हें भगवती और भारती भी कहते हैं ।
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