एक बार एक ईसाई बने हिन्दूने मुझसे कहा, “ईसाई धर्म सबसे महान धर्म है, वह मानवताका प्रसार करता है ।” मैंने पूछा, “क्या आपने हिन्दू धर्मका त्याग करनेसे पूर्व किसी सन्तकी शरणमें रहकर साधना की या धर्म शास्त्रोंका अभ्यास किया ?” उन्होंने कहा, “नहीं ।”
मैंने कहा, “अपनी धृष्टतापूर्ण वक्तव्य हेतु क्षमा चाहती हूं; किन्तु क्या कहीं भी ईसाई बिना धर्मपरिवर्तन किए अपनी सेवा देते हैं ?, तो यह कैसी मानवताकी सेवा है जिसमें ईसाई बनाना ही उनका मुख्य हेतु होता है, जहां-जहां उन्होंने अपनी तथाकथित मानवताका प्रसार किया है, वहां छल या लोभ देकर सभीको ईसाई बनाया है अर्थात जो पन्थ किसी और धर्मके लोगोंको उसके मूल रूपमें स्वीकार नहीं कर सकता है, क्या उनके पास सामान्य मानवीय मूल्य भी हैं ?, ऐसेमें वे मानवताका प्रसार कैसे करेंगे ? आपकी जानकारीके लिए बता दूं, इस ब्रह्माण्डमें मात्र सनातन धर्म ही एक ऐसा धर्म है जो मानवका उसी रूपमें वन्दन और कल्याण ही नहीं करता; अपितु जड और चेतन (जैसे पीपल, गौ, गंगा, तुलसी, हल, शस्त्र इत्यादि), जो इस पूरी सृष्टिमें व्याप्त है, उसका वन्दन करता है और करना सिखाता है, सभीके कल्याणका विचार करता है । अज्ञानतामें आपने एक सर्वश्रेष्ठ दैवी संस्कृतिको छोड एक ऐसी संस्कृतिको अपना लिया है जो अध्यात्म एवं विज्ञानविरहित है । यदि आपको मेरी इन बातोंपर विश्वास न हो तो देखें कि गोस्वामी तुलसीदास जैसे उच्च कोटिके सन्तने रामचरितमानसमें अपने लेखनसे पूर्व किस प्रकार जड और चेतनमें व्याप्त ईश्वरीय तत्त्वकी (राम तत्त्वकी) वन्दना की है, उसका अभ्यास करें और किसी भी अहिन्दू ग्रन्थमें ऐसा उल्लेख आप दिखा दें तो मैं मान लूंगी कि सनातन धर्मसे भी श्रेष्ठ धर्म इस ब्रह्माण्डमें है ।” उस व्यक्तिने अपना सिर झुका लिया । अधिकांश हिन्दुओंने अपने धर्मका त्याग, धर्मज्ञानके अभावमें किया है; अतः हिन्दुओंमें धर्माभिमान जागृत करने हेतु धर्मशिक्षण देना परम आवश्यक है –
तुलसीदासजीद्वारा रामचरितमानसके बालकाण्डमें रामरूपमें जीवमात्रकी वन्दना –
जड चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि ।
बन्दउं सबके पद कमल सदा जोरि जुग पानि ॥
अर्थ : जगतमें जितने जड और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरणकमलोंकी सदा दोनों हाथ जोडकर वन्दना करता हूं ।
चौपाई :
आकर चारि लाख चौरासी । जाति जीव जल थल नभ बासी ॥
सीय राममय सब जग जानी । करउं प्रनाम जोरि जुग जल ॥
अर्थ : चौरासी लाख योनियोंमें चार प्रकारके (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, जरायुज) जीव जल, पृथ्वी और आकाशमें रहते हैं, उन सबसे भरे हुए इस सारे जगतको श्री सीताराममय जानकर मैं दोनों हाथ जोडकर प्रणाम करता हूं ।
क्या ब्रह्माण्डका अन्य कोई धर्म या पन्थ इस प्रकार प्रत्येक जीवमें ईश्वरका दर्शनकर उन्हें वन्दन करता है ?! इसलिए मात्र और मात्र आर्य वैदिक सनातन धर्म ही मानव धर्म है !
tanuja ji aapke vedic sanskriti prasaar ke prayason ke liye mai hriday se aapko naman karti hoon va us parbrahm prameshwar jo sabka antaryami hokar sabko kary karne ki satta de rha hai, se karbaddh prarthana karti hoon ki ve aapko sdaiv oorja aarogya va apani ahaituki kripa pradan karen….. hari om
krutagyta !
Aap jaise logo ki jarurat hi iss dharm ko . mai aapke prayaso ko dil se naman karta hoon