संतों की वाणी


संतों की वाणी अकाट्य और ब्रह्म वाक्य समान होती है उसकी प्रचीति देती यह तुलसीदास रचित रामचरितमानस की यह दोहावली –
* बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी॥
सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन जैसें॥6॥
भावार्थ:-ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितों की वाणी भी संत महिमा का वर्णन करने में सकुचाती है, वह मुझसे उसी प्रकार नहीं कही जाती, जैसे साग-तरकारी बेचनेवाले से मणियों के गुणगान नहीं किए जा सकते ।



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