प्रश्न : गौमूत्र किस गायका लेना चाहिए ?
उत्तर : जो वनमें विचरण करके, व्यायाम करके इच्छानुसार घासका सेवन करे, स्वच्छ पानी पिए, स्वस्थ हो, उस गौका गोमूत्र औषधीय गुणवाला होता है । शास्त्रीय निर्देश है कि ‘अग्रमग्रं चरन्तीनामोषधीनां वने वने’।
प्रश्न : गोमूत्र किस आयुकी गौका लेना चाहिए ?
उत्तर : किसी भी आयुकी बाछा-बछिया, युवा, वृद्ध गौका मूत्र औषधिके प्रयोगमें लाया जा सकता है ।
प्रश्न -क्या वृषभका(बैल) मूत्र औषधिके उपयोगमें आता है ?
उत्तर: नर जातिका मूत्र अधिक तीक्ष्ण होता है; परन्तु औषधिकी उपयोगितामें ‘कम’ नहीं है; क्योंकि प्रजाति तो एक ही है। बैलोंका मूत्र सूंघनेसे ही बंध्याको (बांझको) सन्तान प्राप्त होती है । शास्त्र वचन है: ‘‘ऋषभांष्चापि जानामि राजनपूजितलक्षणान् । येषां मूत्रामुपाघ्राय अपि बन्ध्या प्रसूयते।।’’ (संदर्भ-महाभारत विराटपर्व)
अर्थ: उत्तम लक्षणवाले उन बैलोंका भी मुझे अभिज्ञान (पहचान) है, जिनके मूत्रको सूंघ लेने मात्रसे बंध्या स्त्री गर्भ धारण करने योग्य हो जाती है ।
प्रश्न : गौमूत्रको किस पात्रमें रखना चाहिए ?
उत्तर: गौमूत्रको तांबे या पीतलके पात्रमें न रखें । मिट्टी, कांच, चीनी मिट्टीका पात्र हो अथवा इस्पातका(स्टील) पात्र भी उपयोगी है ।
प्रश्न : गौमूत्र कब तक संग्रह किया जा सकता है ?
उत्तर: गौमूत्र आजीवन चिर गुणकारी होता है । रज(धूल) न गिरे, ठीक तरहसे ढंका हुआ हो, गुणोंमें कभी दूषित(खराब) नहीं होता है । रंग कुछ लाल, काला हो जाता है । गौमूत्रमें गंगाने वास किया है । गंगाजल भी कभी दूषित अथवा खराब नहीं होता है । पवित्र ही रहता है तथा इसमें किसी प्रकारके हानिकारक कीटाणु नहीं होते हैं ।
प्रश्न : क्या जर्सी गायके(???) वंशका गौमूत्र लिया जाना चाहिए ?
उत्तर: कदापि नहीं लेना चाहिए ।
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