शास्त्र वचन


 ईर्षुः परवित्तेषु रूपे वीर्य कुलान्वये ।
सुखभौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिनन्तकः।।

अर्थ : जो दूसरे का धन, सौंदर्य, शक्ति और प्रतिष्ठासे इर्ष्या करता है उसकी व्याधिकी कोई औषधि नहीं है।     

 



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