ईश्वर निर्गुण और निराकार हैं उस निराकार तक पहुंचानेका कार्य, सगुण प्रभुके नाम, सहज ही करता है। वस्तुतः ईश्वर गुप्त है और ईश्वरका नाम प्रकट है , नाम लेते लेते नामधारी नामके कारण गुप्त ईश्वरसे एकरूप हो जाता है और नाम लेनेके कारण भक्तवात्सल भगवान् नामधारकके निकट आ जाते हैं और अंतत: नाम और नामी एकरूप हो जाते हैं और इसे ही अध्यात्म की परम अवस्था कहते हैं । अतः नाम साधन और साध्य दोनों है।
* समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥
नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी॥1॥ – बालकांड रामचरित मानस
अर्थ :-समझनेमें नाम और नामी दोनों एकसे हैं, किन्तु दोनोंमें परस्पर स्वामी और सेवकके समान प्रीति है (अर्थात् नाम और नामीमें पूर्ण एकता होनेपर भी जैसे स्वामीके पीछे सेवक चलता है, उसी प्रकार नामके पीछे नामी चलते हैं। प्रभु श्री रामजी अपने ‘राम’ नामका ही अनुगमन करते हैं (नाम लेते ही वहां आ जाते हैं)। नाम और रूप दोनों ईश्वरकी उपाधि हैं, ये (भगवानके नाम और रूप) दोनों अनिर्वचनीय हैं, अनादि हैं और सुंदर (शुद्ध भक्तियुक्त) बुद्धिसे ही इनका (दिव्य अविनाशी) स्वरूप जाननेमें आता है॥1॥
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