देवता के नाम और उनके स्वरूप में अद्वैत होता है । नाम के द्वारा रूप के साथ प्रीति हो जाती है और स्वरूप से प्रीति होने पर नाम सहज ही स्मरण हो जाता है। स्वरूप से प्रेम हमें नाम सुमिरन की ओर ले जाता है और यही नाम का अखंड सुमिरन हमें सगुण से निर्गुण की ओर ले जाता है !
* को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू॥
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥2॥ – बाल कांड , रामचरितमानस
भावार्थ:-इन (नाम और रूप) में कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना तो अपराध है। इनके गुणों का तारतम्य (कमी-बेशी) सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे। रूप नाम के अधीन देखे जाते हैं, नाम के बिना रूप का ज्ञान नहीं हो सकता॥2॥
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