शत्रुके नाश करनेपर कोई पाप नहीं लगता


 नाधर्मो विद्यते कश्चित् शत्रुन्हत्वातत्तायिन: ।
अधर्म्यंयशस्यं च शात्रवाणाम प्रयाचानम ।।  – महाभारत ५.३.२१
अर्थ : शत्रुके नाश करनेपर कोई पाप नहीं लगता । इसके विपरीत उसके समक्ष विनती करना अधर्म है और किसीकी कीर्तिके लिए यह करना अपमान समान है ।

 



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