गीता सार


इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्‌ ॥ (श्रीमदभगवद गीता ३: ४०)
अर्थ : इंद्रियोंके वासस्थान हैं मन एवं बुद्धि, यह काम, इन मन, बुद्धि और इन्द्रियोंद्वारा ही ज्ञानको आच्छादित करके जीवात्माको मोहित करता है ।
भावार्थ : साधना अर्थात मन, बुद्धि एवं अहंका लय करना | एक बार यह साध्य हो जाये तो व्यक्तिको ईश्वर स्वरूपका अखंड बोध होता है | जीवात्मा अपनेको ईश्वरसे भिन्न इसलिए समझता है क्योंकि उसके आत्मापर मन, बुद्धि एवं अहंका आवरण होता है, ये आवरण उसे उसके आत्मस्वरूपके बोधसे दूर रखकर, वह एक देह है इसका भान कराता है | जब तक ये तीन आवरण आत्माके साथ जुडे रहते हैं, जीवको मोक्ष प्राप्ति नहीं होती और उसे पुनः–पुनः जन्म लेना पडता है | इंद्रियां मन एवं बुद्धिके माध्यमसे कृति करवाती हैं और मनुष्यको मोहके जालमें फंसा कर रखती है | काम अर्थात इच्छायें आत्मतत्त्वके बोधमें मुख्य दीवार होती हैं | इंद्रियोंके नियंत्रणसे इच्छाओंके वेग नष्ट होते हैं और इसीको साधना कहते हैं | जैसे–जैसे हम अपने इच्छाओंकी तृप्ति करना कम कर देते हैं, इंद्रियां नियंत्रित होने लगती हैं और मन एवं बुद्धिका लय होना आरंभ हो जाता है | जैसे हाथके टूट जानेपर जब दो महीने उस प्लास्टर लगा कर उसे एक विशेष अवस्थामें लटका कर रखते हैं और प्लास्टरके काटे जानेके पश्चात हाथ उसी स्थितिमें रहता है और उसे पूर्व समान लानेके लिए व्यायाम करना पडता है | उसी प्रकार मन एवं बुद्धिका उपयोग मात्र आज्ञापालन हेतु करनेसे हमारा मनोलय शीघ्र आरंभ हो जाता है और हम आत्मनियंत्रणकी दिशाकी ओर अग्रसर होते हैं | अतः भारतीय संस्कृतिमें तपोवृद्ध, आयुर्वृध एवं ज्ञानवृद्धके आज्ञापालनके संस्कार हमारे भारतीय संस्कृतिमें अन्तर्भूत थी | अग्रज पुत्र अपने पिताकी, अनुज अपने अग्रज बंधु की, पत्नी अपने पतिकी एवं शिष्य अपने गुरुकी आज्ञापालन करते थे | वस्तुत: ऐसा करनेसे उनकी अध्यात्मिक प्रगति होती थी | और चूंकि सभी जीव साधनारत होते थे अतः आज्ञा देनेवाले उचित आज्ञा देते थे ! कालांतरमें धर्माचरणके अभावमें साधनाका क्रम टूटता चला गया और आज्ञा देनेवालोंमें चैतन्यका प्रमाण कम होता गया और आज्ञापालन करनेवालोंमें भी साधनाका दृष्टिकोण न होनेके कारण अपने स्व अस्तित्त्वको बचाने हेतु अधिक प्रयत्नशील रहने लगा और यहींसे व्यष्टि और समष्टि जीवनमें अशांति एवं संघर्ष आरंभ हो गया | ध्यान रहे अपने सूक्ष्म अस्तित्त्वके विलिनीकरणको साधना कहते हैं और यह आज्ञापालनद्वारा सहज साध्य होता है, मात्र आज्ञापालन किस भावसे और किसका कर रहे हैं यह महत्त्वपूर्ण है | संतोंके अज्ञाके पालन से सर्वाधिक आध्यात्मिक लाभ होता है उसके पश्चात जिस जीवमें साधकत्व अधिक हो, वह धर्माचरणी हो, उसमें त्यागकी प्रवृत्ति हो, वह राष्ट्र एवं धर्म रक्षणार्थ नित्य कर्म कर साधना रत हो ऐसे जीवकी आज्ञापालन करनेसे आध्यात्मिक प्रगति शीघ्र होती है | अधर्मी और पापी जीवके आज्ञापालनसे हम विनाशकी ओर बढते हैं ! -तनुजा ठाकुर


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