गीता सार


यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्‌ ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥ – श्री मद्भग्वद्गीता (४:३१)
अर्थ : हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। और यज्ञ न करनेवाले पुरुषके लिए तो यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है ?
भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण सुखी जीवन और मानवके परम कल्याणकी कुंजी क्या है यह इस श्लोकके माध्यमसे बता रहे हैं | वैदिक संस्कृतिका मुख्य आधार यज्ञ रहा है और सृष्टिके अंत होने तक रहेगा | वस्तुतः वैदिक संस्कृतिमें हमारा सम्पूर्ण जीवन ही यज्ञकर्म होता है | विवाह जहांसे एक गृहस्थकी जीवन आरंभ होता है उसे यज्ञ कहा गया है | गर्भधान संस्कार जिससे जीवकी उत्पत्ति होती है उसे भी यज्ञकर्म कहा गया है | बच्चेके जन्मके पश्चात किए जानेवाले सारे संस्कार यज्ञकर्म होते हैं | सुबहके जागनेसे ही मनुष्यका कर्म यज्ञका प्रारूप ले लेता है और यहां तक की निद्राको भी यज्ञकर्म माना गया है | कर्मको यज्ञ मानकर करनेसे उससे जो फल मिलता है उसकी अनुभूति एक प्रकारसे प्रसादस्वरूप होता है और जब इस भावकी अखंडता सिद्ध हो जाती है तब यज्ञ करनेवाला सामान्य व्यक्ति नहीं रहता अपितु योगी हो जाता है और उसे परब्रह्मकी प्राप्ति होती है |
जो व्यक्ति इस जगतमें इंद्रिय-सुखमें लिप्त रहता है और यज्ञ नहीं करता उसे दुखके थपेडे तो सहन करने ही होंगे | मात्र साधनारत जीवको ही आनंद और सुखकी प्राप्ति होती है जो आज सुखी है उसने भी पूर्व जन्ममें धर्मपालन और साधना कर पुण्य अर्जित किया होता है | यज्ञकर्म करनेवाले जीवपर ईश्वरकी कृपा होती है | साधनारत जीवका लौकिक जीवन यशस्वी तो होता ही मृत्यु उपरांत की यात्रा भी सुखद होता है वहीं आसक्त जीवका व्यावहारिक जीवन दुखी होता है और ऐसेमें उसका पारलौकिक जीवन कैसे सुखी हो सकता है ?
कलियुगका योग्य यज्ञकर्म नामजप है, भगवान श्रीकृष्णने स्वयं कहा है ‘यज्ञानां जपयज्ञोस्मि’ अर्थात यज्ञोंमें मैं जपयज्ञ हूं | कलिकालमें प्रत्येक कर्म करते समय नामजप करना उसका कर्तापन ईश्वरके चरणोंमें अर्पण सबकुछ ईश्वरेच्छा समझ करना यह योग्य यज्ञकर्म है !-तनुजा ठाकुर


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