
पचास के पश्चात एकावन आता है अर्थात गृहस्थ धर्म के उत्तरदायित्व को पूर्णकर अपने जीवन के मूल उद्देश्य की प्राप्ति हेतु प्रयत्नशील होना, ऐसा हमारा धर्मशास्त्र कहता है , और प्राचीन काल में राजा अपने पूर्ण राज-पाठ योग्य उत्तराधिकारी को सौंप कर वन की ओर चले जाते हैं परंतु आज के गृहस्थ सेवा निवृत्त होने पर कुछ तो जीवन को आनंदी (??? ) बनाने हेतु हसोड़ संस्थान (laughter club ) में जाते हैं, कुछ आज के आदर्शहीन नेता की चर्चा में अपना समय व्यतीत करते हैं, कुछ ताश के पत्ते खेल कर तो कुछ टीवी में अनावश्यक कार्यक्रम देखकर अपना बहुमूल्य शेष समय व्यर्थ गंवाते है और जब बच्चे किसी कारणवश दुखी होते हैं तो समाज और ईश्वर को दोष देते हैं !! ध्यान रहे मृत्यु उपरांत मात्र सबसे सूक्ष्मतम संग्रह हमारे साथ जाता है और वह है हमारी साधना अतः वानप्रस्थियों ने मृत्यु उपरांत की तैयारी हेतु साधना अवश्य ही करनी चाहिए ! एक लोकोक्ति है ‘बाढ़े पूत पिता के धरमे और खेती उपजे अपने करमे’ आपके द्वारा किए गए सत्कर्म और साधना का फल आपकी अगली पीढ़ी को भी प्राप्त होता , व्स्तुत: साधना तो इतनी सूक्ष्म होती है कि वह तो कुल के मूल में स्वतः ही चली जाती और उसका परिणाम अगली पीढ़ी में स्वतः उसके सुख , समृद्धि , ऐश्वर्य एवं तेजस्विता के रूप में दिखता है !-तनुजा ठाकुर
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